लखनऊ। प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ने वाले एक बड़े आर्थिक बोझ की ओर ध्यान खींचते हुए राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने बिजली की खरीद-बिक्री की मौजूदा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। परिषद का कहना है कि उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) दिन में अपनी बिजली सस्ते दाम पर बेच रहा है, जबकि रात में जरूरत बढ़ने पर उसे वही बिजली कहीं अधिक कीमत पर खरीदनी पड़ रही है। इस असंतुलन का सीधा असर आम उपभोक्ता की बिजली दरों पर पड़ने की आशंका जताई गई है।
दिन में सस्ती बिक्री, रात में महंगी खरीद
परिषद की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार कॉरपोरेशन ने दिन के समय औसतन 3.77 रुपये प्रति यूनिट की दर पर बिजली बेची, लेकिन रात में मांग बढ़ने पर उसे 6.55 रुपये प्रति यूनिट तक की दर पर बिजली खरीदनी पड़ी। यानी जिस बिजली को कम कीमत पर हाथ से निकाला गया, उसी की भरपाई के लिए लगभग दोगुनी रकम चुकानी पड़ी।
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समग्र तस्वीर और भी चिंताजनक है। परिषद के मुताबिक कॉरपोरेशन अब तक 1619.56 मिलियन यूनिट बिजली खरीद चुका है, जिसकी औसत लागत 6.52 रुपये प्रति यूनिट रही। इसके उलट उसने 6060.29 मिलियन यूनिट बिजली पावर एक्सचेंज के जरिए बेची, जिसकी औसत कीमत महज 3.77 रुपये प्रति यूनिट रही। खरीद और बिक्री की इन दरों के बीच का यह बड़ा फासला ही उपभोक्ता संगठन की चिंता की जड़ है। परिषद का मानना है कि महंगे दाम पर खरीदी गई बिजली का भार आखिरकार किसी न किसी रूप में आम उपभोक्ता तक ही पहुंचेगा और उसे अतिरिक्त भुगतान करना होगा।
लागत समान, फिर दिन-रात में दाम का अंतर क्यों
राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने इस पूरी व्यवस्था पर तीखा सवाल उठाया। उनका कहना है कि बिजली की उत्पादन लागत दिन और रात के हिसाब से बदलती नहीं है। एक यूनिट बिजली बनाने में जो खर्च दिन में आता है, वही रात में भी आता है। ऐसे में पीक आवर्स यानी अधिकतम मांग वाले घंटों के नाम पर दामों का कई गुना बढ़ जाना अपने आप में सवाल खड़ा करता है।
वर्मा के अनुसार यह अंतर इस बात का संकेत है कि मौजूदा व्यवस्था में गहरी खामियां मौजूद हैं। उन्होंने आशंका जताई कि इन्हीं खामियों की आड़ में कालाबाजारी जैसी स्थितियां पनप रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि देश की कई उत्पादन इकाइयां पावर और एनर्जी एक्सचेंज पर मांग बढ़ने के मौके को अपने फायदे में बदल रही हैं और ऊंची मांग के समय अपनी बिजली को मनमाने दामों पर बेच रही हैं। इसका सीधा खामियाजा उन उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ता है, जिनका इस पूरी प्रक्रिया से कोई लेना-देना नहीं होता।
परिषद का तर्क है कि जब उत्पादन की वास्तविक लागत स्थिर है, तो समय के आधार पर कीमतों में इतना भारी उतार-चढ़ाव तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता। इसी आधार पर परिषद ने देश में संचालित पावर एक्सचेंज की मौजूदा कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
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केंद्रीय ऊर्जा मंत्री को पत्र
अपनी आपत्तियों को आगे ले जाते हुए वर्मा ने केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर के पास एक पत्र पहुंचाया है। इसमें उन्होंने आग्रह किया है कि बिजली की खरीद-फरोख्त से जुड़े जो प्रावधान उपभोक्ताओं के घाटे की वजह बन रहे हैं, उन्हें बिना देरी बदला जाए। उनका मानना है कि जब तक एक्सचेंज की मौजूदा कार्यप्रणाली नहीं सुधरती, तब तक आम उपभोक्ता को इस अतिरिक्त भार से छुटकारा मिलना मुश्किल है।
सेंट्रल एडवाइजरी कमेटी के सदस्य के रूप में भी अवधेश कुमार वर्मा ने केंद्र सरकार से एनर्जी एक्सचेंज के नियमों में तुरंत संशोधन की पैरवी की है। उनका कहना है कि मौजूदा ढांचा उत्पादन इकाइयों को तो लाभ पहुंचा रहा है, लेकिन अंतिम उपभोक्ता लगातार घाटे में जा रहा है। उन्होंने इसे एक ऐसी प्रणाली बताया, जिसमें मांग और आपूर्ति के नाम पर दामों को बेलगाम होने की छूट मिल गई है।
परिषद ने स्पष्ट किया कि उसका मकसद किसी व्यवस्था का विरोध करना नहीं, बल्कि उस ढांचे में पारदर्शिता लाना है, जहां उपभोक्ता का हित सबसे ऊपर हो। संगठन का कहना है कि अगर समय रहते इन नियमों की समीक्षा नहीं की गई, तो आने वाले समय में बिजली की दरें और दबाव बढ़ा सकती हैं। फिलहाल परिषद की निगाहें केंद्र सरकार के रुख पर टिकी हैं कि इस पत्र पर क्या कार्रवाई होती है और एक्सचेंज की व्यवस्था में कोई बदलाव सामने आता है या नहीं।

