लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के 69वें दीक्षांत समारोह में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने 1,25,285 विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान कीं। अटल बिहारी वाजपेयी वैज्ञानिक कन्वेंशन सेंटर में आयोजित इस समारोह में उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी लोकतंत्र की ताकत है लेकिन इसी आजादी की आड़ में प्रधानमंत्री को गालियां दी जाएं तो यह पूरे समाज के लिए आत्मचिंतन का विषय है। शिक्षकों और छात्रों से उन्होंने पूछा कि हमारी शिक्षा प्रणाली आखिर किस तरह की पीढ़ी तैयार कर रही है। 111 मेधावी विद्यार्थियों को 204 पदक देकर सम्मानित किया गया।
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शिक्षा और संस्कार का सवाल
राज्यपाल ने कहा कि शिक्षा का असली मकसद केवल डिग्री बांटना नहीं है। किसी भी विद्यार्थी का व्यक्तित्व तब पूर्ण माना जाता है जब वह ज्ञान के साथ-साथ नैतिक मूल्यों को भी आत्मसात करे। उन्होंने कहा कि शिक्षण संस्थान केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने की जगह नहीं हैं बल्कि ये वह स्थान हैं जहां सामाजिक जिम्मेदारी और जीवन मूल्यों की नींव रखी जाती है।
उन्होंने कहा कि जब कोई शिक्षित युवा सार्वजनिक मंच पर अभद्र भाषा का इस्तेमाल करता है तो सवाल केवल उस व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था का उठता है। उनके अनुसार शिक्षक और छात्र दोनों को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर शिक्षा किसी के भीतर संस्कार और सामाजिक बोध नहीं जगा पा रही तो उस शिक्षा की सार्थकता पर प्रश्नचिह्न लगता है।
अभिव्यक्ति की सीमा क्या हो
आनंदीबेन पटेल ने कहा कि बोलने की आजादी हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन जब स्वतंत्रता का इस्तेमाल गरिमा को ठेस पहुंचाने के लिए किया जाए तो यह लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि देश के प्रधानमंत्री का पद केवल किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसे में उस पद की गरिमा का सम्मान करना हर नागरिक का नैतिक दायित्व है।
उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे असहमति जताने के लिए तर्कसंगत और शालीन तरीके अपनाएं। विरोध और अपमान में फर्क होता है और यह फर्क समझना ही शिक्षित होने की पहचान है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के दौर में युवा पीढ़ी पर यह जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है कि वे विवेक के साथ अपनी राय व्यक्त करें।
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गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की जरूरत
राज्यपाल ने शिक्षण संस्थानों से आग्रह किया कि वे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने को सर्वोच्च प्राथमिकता दें। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय केवल डिग्रियां देने की फैक्ट्री नहीं बनने चाहिए। यहां से निकलने वाला हर स्नातक समाज में सकारात्मक योगदान देने में सक्षम होना चाहिए। उनके अनुसार शिक्षक इस पूरी प्रक्रिया की धुरी हैं क्योंकि वे ही छात्रों के व्यक्तित्व को गढ़ते हैं।
उन्होंने कहा कि समाज को इस दिशा में मिलकर काम करना होगा। परिवार, विद्यालय और समाज तीनों की जिम्मेदारी है कि वे युवा पीढ़ी को नैतिक रूप से मजबूत बनाएं। दीक्षांत समारोह में छात्र-छात्राओं को उपाधियां प्रदान की गईं और राज्यपाल ने मेधावी विद्यार्थियों को पुरस्कृत भी किया।

