लखनऊ, 14 अगस्त। विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शुक्रवार को लखनऊ के लोकभवन में आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुए। इससे पहले पटेल प्रतिमा से लोकभवन तक पैदल मार्च निकाला गया, जिसमें मुख्यमंत्री के साथ उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और अन्य नेता भी शामिल रहे। मुख्यमंत्री ने विभाजन त्रासदी पर आधारित प्रदर्शनी का अवलोकन किया और विस्थापित परिवारों के सदस्यों को सम्मानित किया।
विभाजन के लिए ठहराया जिम्मेदार
मुख्यमंत्री ने कहा कि 1947 का विभाजन विश्व मानवता के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक है। यह दिवस केवल स्मरण का अवसर नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि यह त्रासदी क्यों हुई, इसके लिए कौन जिम्मेदार था और आखिर कब तक देश इसकी कीमत चुकाता रहेगा। पाकिस्तान समर्थकों ने जो भूभाग मांगा भी नहीं था, उसे भी जबरन पाकिस्तान को सौंप दिया गया, यह बात मुख्यमंत्री ने रेखांकित की। सिंध हिंदू व सिंधी बहुल क्षेत्र था और पंजाब पंजाबी बहुल था, फिर भी दोनों को जबरन पाकिस्तान के हवाले कर दिया गया।
बंगाल की सीमा पर आज भी हिंदू गांव दिखते हैं, लेकिन उस भूभाग को भी बांग्लादेश को सौंप दिया गया। जिस कांग्रेस पर देश ने आंखें बंद करके भरोसा किया था उसी ने उस विश्वास की कीमत विश्वासघात के रूप में देश को दी। उनके अनुसार विभाजन की यह कीमत आज भी भारत चुका रहा है, जो कभी आतंकवाद, कभी नक्सलवाद और कभी माओवाद के रूप में सामने आती रही है।
विभाजन के दौरान लाखों हिंदू, सिख, बौद्ध और जैन अपने घरों से बेघर हुए और लाखों लोगों का कत्लेआम हुआ, मुख्यमंत्री ने इसका विशेष उल्लेख किया। अकेले पंजाब में और अकेले पाकिस्तान में ही दस लाख से अधिक लोग मारे गए थे। उस दौर में ट्रेनों के भीतर भी भीषण हत्याकांड हुए, जिनमें बड़ी संख्या में विस्थापित हो रहे लोग मारे गए। मुख्यमंत्री ने इसे मानव इतिहास की सबसे भीषण त्रासदियों में से एक बताते हुए कहा कि यह पीड़ा आज भी लोगों के जेहन में जिंदा है।
जिलावार नागरिकता के आंकड़े
मुख्यमंत्री ने कहा कि पाकिस्तान से निकाले गए करीब 8 से 10 हजार सिख और पंजाबी परिवार बिजनौर में 1947 से बिना किसी ठौर-ठिकाने के रह रहे थे। वर्तमान सरकार ने उनके कागजात दुरुस्त कराए, नागरिकता प्रदान की और जमीन के दस्तावेज उपलब्ध कराए। और बांग्लादेश से निकाले गए हजारों परिवारों को भी पीलीभीत में नागरिकता और जमीन के कागज दिए गए।
लखीमपुर खीरी में बांग्लादेश से निकाले गए करीब 16 हजार पीड़ित हिंदू व बौद्ध परिवारों को नागरिकता दी गई, यह जानकारी मुख्यमंत्री ने साझा की। रामपुर में पाकिस्तान से निकाले गए सिख परिवारों के कागजात दुरुस्त कराने और उन्हें नागरिकता देने की प्रक्रिया जारी है। यह काम कांग्रेस को 1947 के तुरंत बाद करना चाहिए था, लेकिन उसने शत्रु संपत्तियों की बंदरबांट में समय गंवाया और विस्थापितों को उनकी जब्त संपत्ति की भरपाई भी नहीं दी।
बांग्लादेश हिंसा पर टिप्पणी
आगे उन्होंने कहा, जो लोग 1947 में मौन थे और जिनकी नजरें किसी भी तरह सत्ता पाने पर टिकी थीं, उनका चरित्र आज भी वही है। हाल में बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुई हिंसा की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय भी यह दल मौन रहे। इन दलों को अपने वोट बैंक के खिसकने का डर था, इसलिए उन्होंने प्रतिक्रिया देने से परहेज किया। उनके अनुसार इन दलों के लिए पीड़ित हिंदुओं का कत्लेआम मायने नहीं रखता, बल्कि उनका वोट बैंक मायने रखता है।
स्वतंत्रता सेनानियों का किया स्मरण
सैकड़ों वर्ष पहले वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी करीब 24 से 25 प्रतिशत हुआ करती थी, मुख्यमंत्री ने यह उल्लेख किया। इतना समृद्ध होने के बावजूद देश दो कारणों से गुलाम हुआ, जिनमें से एक जाति, क्षेत्र और भाषा को लेकर आपसी अंतर्विरोध था और दूसरा इन्हीं अंतर्विरोधों का फायदा उठाकर रचा गया षड्यंत्र। सामूहिक रूप से एकजुट होकर न लड़ पाने के कारण देश को गुलामी झेलनी पड़ी।
मुख्यमंत्री ने महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, राजगुरु, पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे सहित स्वतंत्रता संग्राम के महापुरुषों का स्मरण किया। उनके अनुसार कांग्रेस अपने स्वार्थ के लिए देश को क्षेत्र के आधार पर लड़ाती रही, कभी उत्तर-दक्षिण तो कभी पूरब-पश्चिम के नाम पर।
जिन क्रांतिकारियों ने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया, उन्हें भुला दिया गया, जबकि जिन लोगों ने अपने स्वार्थ की सत्ता के लिए देश का विभाजन कराया, वे देश की हर संस्था पर हावी हो गए, उन्होंने कहा कि देश की कई संस्थाओं के नाम आज भी एक ही परिवार के नाम पर हैं।

