लखनऊ। राम मंदिर के दानपात्रों से चढ़ावे की राशि में कथित गबन की जांच कर रही SIT ने मंगलवार सुबह अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद को सौंप दी। रिपोर्ट में चढ़ावा चोरी से लेकर कमीशनखोरी के सबूत शामिल बताए जा रहे हैं। नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद, गिनती प्रक्रिया में हेरफेर और निगरानी तंत्र की विफलता — तीनों को मिलाकर यह एक सुनियोजित गबन का मामला बताया गया है। रिपोर्ट अब मुख्यमंत्री के समक्ष रखी जाएगी।
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SIT ने सौंपी प्रारंभिक रिपोर्ट
SIT में शामिल लखनऊ मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत, लखनऊ आईजी रेंज किरन एस और विशेष सचिव वित्त नील रतन मंगलवार सुबह करीब 11 बजे शासन पहुंचे और तीनों ने मिलकर गोपनीय जांच रिपोर्ट संजय प्रसाद को सौंपी।
सूत्रों के मुताबिक रिपोर्ट में ट्रस्ट के पदाधिकारियों पर सबसे बड़े सवाल उठाए गए हैं। जिन पदाधिकारियों की निगरानी में चढ़ावा चोरी हुई, उन्हें लापरवाही का दोषी पाया गया है। कुछ की सक्रिय भूमिका की भी आशंका जताई गई है। फिलहाल सबसे अधिक सवालों के घेरे में ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, पदाधिकारी अनिल मिश्रा और निर्माण सहायक गोपाल राव हैं। इनके रिश्तेदारों और करीबियों का भी रिपोर्ट में उल्लेख है — खासतौर पर चंपत राय के करीबी टिन्नू यादव, अनिल मिश्रा के रिश्तेदार और गोपाल राव के रिश्तेदार सोम का नाम सामने आया है।
SIT के अनुसार चढ़ावा गबन में सीधे तौर पर 25 से 30 लोगों की भूमिका पाई गई है। इन सभी पर जल्द FIR दर्ज होने की संभावना है। अनिल मिश्रा पर 40 प्रतिशत कमीशन लेने के आरोपों का भी जिक्र रिपोर्ट में किया गया है। SIT ने स्पष्ट किया है कि यह प्रारंभिक जांच है और अगले दो सप्ताह में विस्तृत रिपोर्ट भी तैयार की जाएगी जिसमें और सबूत सामने आएंगे।
कैसे हुआ गबन — शातिराना तरीका
यह गबन किसी एक व्यक्ति का काम नहीं था। मंदिर में प्रतिदिन मिलने वाले चढ़ावे की गिनती की जिम्मेदारी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को सौंपी गई थी। बैंक ने गिनती के लिए एक आउटसोर्सिंग कंपनी के जरिए कर्मचारी रखे, लेकिन कंपनी में वही लोग नियुक्त किए गए जिन्हें ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने तय किया था। ये सभी ट्रस्ट के बड़े नामों के रिश्तेदार या परिचित थे।
इस पूरे नेटवर्क का केंद्र था टिन्नू यादव — जिसने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर करीब 35 से 40 अपने लोगों को नौकरी दिलाई। ये कर्मचारी महज 12 से 18 हजार रुपये मासिक वेतन पर काम करते थे, लेकिन उन्हें तनख्वाह की परवाह नहीं थी — वे गिनती के दौरान ही रकम पार कर रहे थे।
चोरी का तरीका शातिराना था। गिनती शुरू करने से पहले सभी दानपात्रों की रकम एक जगह इकट्ठा की जाती थी, जिससे कुल राशि पहले से पता नहीं रहती थी। इसी का फायदा उठाकर कर्मचारी गिनती के बीच में ही रकम अलग कर लेते थे। अंत में जो बचता, उसी का रिकॉर्ड दर्ज होता और चोरी पकड़ में नहीं आती थी।
सवा साल तक चलती रही चोरी
यह गबन कोई एकाध घटना नहीं थी — यह सिलसिला करीब सवा साल तक बेरोकटोक चलता रहा। महाकुंभ और माघ मेले के दौरान जब अयोध्या में श्रद्धालुओं की संख्या करोड़ों में पहुंची, तो चढ़ावे की राशि कई गुना बढ़ गई। इसी सुनहरे मौके का फायदा उठाते हुए गिनती करने वाले कर्मचारियों ने एक-एक दिन में 10 से 15 लाख रुपये तक पार किए।
पकड़े जाने से ठीक पहले के महीनों में गबन और अधिक बढ़ गया था। सोशल मीडिया पर गबन की गई कुल राशि 200 करोड़ से लेकर 1400 करोड़ रुपये तक बताई जा रही है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है।
सबसे बड़ी चूक यह रही कि ट्रस्ट के अपने लोग होने के कारण इन कर्मचारियों की न तो तलाशी होती थी और न ही उनका सत्यापन किया गया था। वे गले में आईकार्ड पहनकर मंदिर के हर कोने में बेखौफ आते-जाते थे।
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आठ महीने के डिलीट होने के आरोप
मंदिर परिसर में CCTV कैमरे लगे थे, लेकिन रियल-टाइम मॉनिटरिंग नहीं होने के कारण चोरी का तुरंत पता नहीं चल सका। SIT जांच शुरू होने के बाद इन फुटेज को साक्ष्य के रूप में जब्त किया गया है और इनसे कई अहम खुलासे होने की उम्मीद है।
हालांकि ट्रस्ट के पूर्व पदाधिकारी महिपाल सिंह ने आरोप लगाया है कि आठ महीने के CCTV फुटेज जानबूझकर डिलीट कर दिए गए। यदि यह आरोप सच साबित होता है तो यह मामले को और गंभीर बना सकता है।
SIT ने यह भी संकेत दिया है कि बैंक के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से भी इनकार नहीं किया जा सकता। रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद ट्रस्ट में बड़े बदलाव और दोषियों पर कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है।



