लखनऊ। अलीगंज अग्निकांड की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, लापरवाही की परतें एक-एक कर खुल रही हैं। लखनऊ विकास प्राधिकरण की आंतरिक जांच में पांच जोनल अफसरों समेत 18 इंजीनियर दोषी पाए गए हैं। एलडीए वीसी ने इन सभी के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति करते हुए रिपोर्ट शासन को भेज दी है। इससे पहले हादसे की रात ही एक अवर अभियंता और एक सहायक अभियंता को निलंबित कर दिया गया था — अब 16 और अधिकारियों की रिपोर्ट भेजी गई है। जांच में यह भी सामने आया है कि जिस इमारत में आग लगी उसमें धुआं बाहर निकलने की कोई व्यवस्था नहीं थी — यही कारण रहा कि 15 लोगों की दम घुटने से मौत हुई।
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2016 से चलती रही मिलीभगत
जांच में सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ कि पुरनिया चौराहे के पास मकान नंबर 2813 में बनी इस इमारत का नक्शा आवासीय उपयोग के लिए पास कराया गया था, लेकिन निर्माण पूरी तरह व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए किया गया। भूतल पर दुकान, पहली मंजिल पर गोदाम और ऊपरी मंजिलों पर एनिमेशन सेंटर तथा कोचिंग — यह सब उस अनुमति के बिल्कुल विपरीत था जो कागजों पर दी गई थी।
सबसे गंभीर तथ्य यह है कि इस अवैध निर्माण के खिलाफ 2016 में ध्वस्तीकरण का आदेश दिया गया था। लेकिन वह आदेश लागू होने से पहले ही निरस्त कर दिया गया। जांच में सामने आया कि तत्कालीन विहित प्राधिकारी दुर्गेश श्रीवास्तव ने उस आदेश को रद्द किया था। अगर 2016 का वह आदेश लागू हो जाता तो न यह इमारत खड़ी रहती और न ही 15 जिंदगियां जातीं। यह महज प्रशासनिक चूक नहीं — यह सुनियोजित लापरवाही है जिसकी कीमत निर्दोष लोगों ने अपनी जान देकर चुकाई।
FIR में दर्ज तथ्यों के अनुसार इमारत में आग सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं था। प्रतिष्ठान के मैनेजर, डायरेक्टर और उनके सहयोगियों ने फायर सेफ्टी उपकरण तो नहीं लगाए, साथ ही बिल्डिंग में एक ही प्रवेश और निकास द्वार था। कोई आपातकालीन निकास नहीं, कोई अतिरिक्त सीढ़ी नहीं। एसी के आउटर यूनिट और बिजली के अन्य उपकरण असुरक्षित तरीके से भवन के अंदर ही लगाए गए थे। बिजली की व्यवस्था भी अनियमित थी। आग लगने पर दमकल कर्मियों और एनडीआरएफ को दीवार काटकर भवन में प्रवेश करना पड़ा — क्योंकि अंदर जाने का कोई और रास्ता नहीं था।
एक भी एग्जिट नहीं था
FIR में दर्ज विवरण के अनुसार जब गोदाम में आग भड़की तो पूरी इमारत में धुआं भर गया। ऊपरी मंजिलों पर मौजूद लोग बाहर निकलने का रास्ता न मिलने से फंसे रहे। इमारत में धुआं बाहर निकलने की कोई व्यवस्था नहीं थी — न वेंटिलेशन, न स्मोक डक्ट। नतीजा यह हुआ कि दम घुटने से 15 लोगों की मौत हुई और नौ घायल हो गए। आरोपियों को पता था कि ऐसी किसी आपात स्थिति में भवन के अंदर फंसे लोगों की जान जा सकती है, फिर भी कोई सुरक्षा इंतजाम नहीं किया गया।
आग इतनी तेज थी कि आसपास के घरों और फ्लैटों तक फैलने का खतरा पैदा हो गया था। पड़ोसी इलाकों में दहशत फैल गई। करीब दो घंटे चले बचाव अभियान के दौरान दमकल, पुलिस और एसडीआरएफ ने मिलकर काम किया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
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15 पीड़ित — नाम, उम्र और पहचान
इस हादसे में जो 15 लोगों की जान गई उनमें से अधिकांश युवा थे — एनिमेशन सेंटर के कर्मचारी, ग्राफिक डिजाइनर, आईटी टेक्नीशियन और छात्र। ये वे लोग थे जो अपने करियर की शुरुआत कर रहे थे।
- अनामिका (30), कोलकाता — एनिमेशन सेंटर कर्मचारी
- सुखमनी सिंह (24), आदर्श नगर आलमबाग — एनिमेशन सेंटर कर्मचारी
- शहजान सिद्दीकी (18), सीतापुर रोड बीकेटी — कंप्यूटर डिजाइनर
- ज्योति (26), ज्ञान विहार कॉलोनी कमता चिनहट — एनिमेशन सेंटर कर्मचारी
- अब्दुल रहमान (24), सीतापुर बिसवां — आईटी टेक्नीशियन
- मोहम्मद अम्मार (24), बाराबंकी — एनिमेशन सेंटर कर्मचारी
- आदित्य श्रीवास्तव (24), सीतापुर कैथी टोला बिसवां — छात्र
- जैनिल (26), मध्य प्रदेश अनूपपुर — ग्राफिक डिजाइनर
- नीलेश (27), हजरतगंज मार्टिन पुरवा — ग्राफिक डिजाइनर
- सौमिल्य (24), कोलकाता — एनिमेशन सेंटर कर्मचारी
- अनुक्षा (24), अवध शिल्पग्राम शांतिनगर — एनिमेशन सेंटर कर्मचारी
- भविष्य (23), अलीगंज — गेमिंग आर्टिस्ट
- सूरज सिंह (27), कानपुर गोविंद नगर — एनिमेशन सेंटर कर्मचारी
- संयम (27), कानपुर — एनिमेशन आर्टिस्ट
- सागर (28), जानकीपुरम लखनऊ
इन 15 नामों के पीछे 15 परिवारों का दर्द है। इनमें से कई लखनऊ से बाहर के थे — कोई कोलकाता से आया था, कोई मध्य प्रदेश से, कोई बाराबंकी से। सब एक सपने के साथ यहां आए थे। अब सवाल यह है कि 18 इंजीनियरों की रिपोर्ट शासन तक पहुंच गई है — क्या सजा भी उतनी ही तेजी से मिलेगी?

