📌 डॉ. पंडित विनय कुमार, पटना
झारखंड के देवघर, गोदाम, गोड्डा, साहिबगंज, जामताड़ा और पाकुड़ जिलों में मैथिली भाषा बोली जाती है। कभी इस जिले की संबंधित जनता ने सरकार से मिथिला राज्य घोषित करने की भी मांग की थी। मैथिली भाषा का अंगिका भाषा से बड़ा ही घनिष्ठ संबंध है। अभी वर्तमान झारखंड सरकार ने अपने राज्य में मैथिली और अंगिका दोनों को ही द्वितीय राज्य भाषा का पेटेंट प्रदान किया है।
आज जब कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 हिन्दी भाषा में बच्चों के शिक्षा पर जोर दे रही है वहीं क्षेत्रीय भाषा में भी बच्चों को कक्षा कक्ष में बोलने / जवाब देने के लिए प्रेरित किया जा रहा है क्योंकि बच्चों में सुनना , बोलना , पढ़ना और लिखना – चार कौशल के विकास के लिए ही नहीं , बल्कि बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए आज जरूरी कहा जा रहा है। यही कारण है कि मैथिली के साथ – साथ अंगिका , बज्जिका एवं अन्य क्षेत्रीय भाषा एवं बोली का अपना विशिष्ट महत्व है। आज मिथिलांचल प्रदेश में मुख्य रूप से नचारी, महेश बानी, कांवर गीत , बोल बम गीत, पारंपरिक विवाह गीत एवं जन्मोत्सव व आनंद की मधुर ध्वनियाँ यहाँ के कण-कण में सुनी जा सकती हैं जो देवघर में बाबा के जलाभिषेक के अवसर पर प्रत्येक सावन मास में विशेष रूप में गाये जाते हैं तथा जिसमें जीवन के सुख-दुःख, आनंद – अवसाद एवं विभिन्न प्रकार के प्रकृति प्रदत्त कलित- कमनीय रूप सहज ही देखे जा सकते हैं।
इन लोकगीतों में जीवन को एक अलग तरीके से दर्शाया गया है, जिसमें नैसर्गिक व उदात्त प्रेम, विवाह, भाईचारे और अपनेपन के साथ जीना सिखाया जाता है। इन गीतों के मधुर बोल और उन से नि:सरित होते शब्द मन-प्राणों में जैसे मिश्री घोल देते हैं। जो मन प्राणों के लिए हृदय ग्राह्य प्रतीत होते हैं। इसके साथ -साथ वे हमें सही अर्थों में अच्छे तरीकों से जीना भी सिखलाते हैं, इसके मूल में सबका साथ, सबका विकास, सामुदायिक सहयोग और मानवीय प्रेम का केवल प्रदर्शन नहीं है बल्कि वह हमें बेहतर तरीकों से घर , परिवार व समाज में रहना भी सिखलाते हैं क्योंकि हमारा यह क्षेत्रीय लोकगीत सामाजिक, पारिवारिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन और लोक – व्यवहार से ओत-प्रोत है।
भारतीय लोक जीवन अपने वातावरण और परिवेश के साथ – साथ मैथिली लोकगीतों में भगवान शिव का स्थान अन्य देवताओं से बिल्कुल अलग, विशिष्ट और निराला है। हमारा धर्म शास्त्र जहां भगवान शिव को ‘देवों के देव महादेव’ या ‘प्रलयं कारी’ के रूप में प्रस्तुत करता है, वहीं मिथिला में प्रचलित लोकगीतों की स्वर लहरियां उन्हें शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता के रूप में मानते हैं, लोकगीतों के ये भक्ति – भाव बहुत ही सहज, सरल और अपने परिवार की परंपरा के रूप में अंकित कर गौरव का अनुभव कराती हैं। उन्हें ‘औघड़ दानी’ और ‘भोलेनाथ’ भी कहा जाता है, जो एक लोटे जल से प्रसन्न हो जाते हैं और भक्तों को मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। यही कारण है कि भारत के गांव-गांव में गाए जाने वाले लोकगीत (जैसे- सोहर, बन्ना, कजरी, चैती, विवाह गीत) में शिव सबसे लोकप्रिय देव हैं। इस प्रकार सावन का महीना शिव की पूजा का प्रसिद्ध महीना है जिसमें लड़कियां और महिलाएं विशेष भक्ति – भाव से सोमवारी व्रत कर फलाहार या उपवास करती हैं। कहीं-कहीं तो महीने भर शिव जी की भक्ति में लोग लीन हो जाते हैं। चतुर्दिक उनकी भक्ति में भजन-कीर्तन और श्रावक की अनुगूंज की संग्रहित तस्वीरें सहज ही मन को मोहित कर देती हैं। यह मौसम और यह महीना व शिव के दरबार में डूबा हुआ भक्तिपूर्ण नजारा हमारे मन – मस्तिष्क को सहज ही शिव -भक्ति से जोड़ देता है।
मिथिला के लोकगीत में शंकर भगवान केवल देवाधिदेव महादेव के रूप में पूजित ही नहीं ही हैं बल्कि वे एक कारीगर हैं, एक पति हैं, एक बाबा हैं, और “घर के एक सदस्य” भी हैं। मिथिला प्रक्षेत्र के लोकजीवन में शिव का रूप सबसे बड़ा ही उदात्त, परिष्कृत और मानव जीवन के लिए सबसे बड़ा प्रेरक भी है।
मिथिला क्षेत्र में शंकर के लिए विशेष महत्वपूर्ण स्थान का कारण यह है कि उनका चरित्र , स्वभाव , विचार उदात्त है । इसीलिए उन्हें सावन में महीने भर ही नही , बल्कि सालों भर पूजते हैं।
भगवान शंकर रूप-सौंदर्य और चारित्रिक उदात्तता : मानव जीवन के लिए वे एक उपदेशक ही नहीं, पूजनीय और आराध्य भी हैं। यों तो साल भर भगवान शंकर की पूजा-अर्चना की जाती है फिर भी सावन के महीने में शिव की आराधना विशेष रूप से भारतीय जनमानस को प्रभावित करती है। मानव जीवन के विभिन्न अंतर्संबंध और लोक व्यवहार भगवान शंकर के जीवन से संबंधित हैं। वे न केवल एक देवता के रूप में प्रतिष्ठित हैं बल्कि वे मानव जीवन के व्यवहार , विचार, स्वभाव आदि से जुड़कर हमारे लिए प्रेरणा के रूप बनते हैं तथा हमारे मन तथा बुद्धि को भी पवित्र करते हैं। मिथिला के लोकप्रिय लोकगीतों में भगवान शंकर को मित्र या पति और माता पार्वती जी को बेटी के रूप में याद किया जाता है। ऐसा विचार आने से उनकी प्रति भक्ति और पारिवारिक प्रेम का भाव सहज ही उदित हो जाता है।
मित्र भाव से शिव की सेवा
मिथिला में शिव को “गौरी के वर” और “हिमालय के भगवान” के रूप में पूजा जाता है। मिथिला की हर बेटी खुद को “पार्वती” और हर लड़की को “शंकर” का भाव सहयोगी रूप में दिखता है। इससे हमारे मन में एक नई आत्मीयता का भाव – संचार होता है।
त्याग और सरलता की प्रतिमूर्ति
भगवान शंकर का रूप अनोखा है। वे भक्तों पर जल्दी आकर्षित हो जाते हैं। उन्हें किसी चीज़ की चाहत नहीं होती, वे भोला-भंडारी कहलाते हैं और भांग-धतूरा खाते हैं। मिठाई या मिठाई या अन्य स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों की चाहत नहीं। इसलिए गरीब से गरीब व्यक्ति तथा निर्धन एवं अभावग्रस्त किसान एवं श्रमिक भी शिव के साथ अपनी सबसे अधिक समानता का भाव महसूस करते हैं। इसीलिए वे मानव जीवन को प्रेरित करने वाले देव भी कहलाते हैं।
विवाह के देवता के रूप में चित्रण
मिथिला में विवाह का सबसे बड़ा गीत “विवाह गीत” जो लोक परंपरा और लोकजीवन से जुड़ा है वह शिव-पार्वती के विवाह पर आधारित है। इसलिए विवाह के पवित्र स्थान पर भगवान शंकर और पार्वती सदैव याद रहते हैं। यहां का लोक – जीवन भगवान शंकर की उदात्त चारित्रिक परिकल्पना पर आधारित है। वह इस कारण से कि शंकर का चरित्र यहां के जन – जीवन को विशेष पसंद आता है और यहां के वासी भगवान शंकर और पार्वती से विशेष रूप से जुड़े हुए हैं।
मैथिली लोकगीतों में शंकर के पाँच प्रमुख रूप विशेष प्रभावकारी हैं। यह किरदार लोक जीवन में इतना रच-बस गया है कि आम आदमी उनसे अपने को अलग नहीं कर पाता। यहां का प्रचलित ग्रामीण परिवेश गत परिवार और सामाजिक जीवन मधुर रस से पूर्णतया सिंचित् व परिचित है।
शिव विवाह गीत
मिथिला क्षेत्र में गायकी की प्रधानता है। रावण के कई रूप हैं लेकिन सबों में श्रेष्ठ शिव की भक्ति से संबंधित रावण में जो प्रेरक तत्व है वह अद्भुत है। सच तो यह है कि शिव-पार्वती का विवाह मिथिला का सबसे बड़ा लोक-उत्सव है। इन गीतों या भजनों को पूरा करने में एक महीना लगता है। एक चित्र देखें:
“गे माई कोना बियाहब शिव बौराह गे,
शिव के मठ पर जाता भय,
अंग में भभूति रमाए गे।
गे माई कोना बियाहब शिव बौराह गे..
काल्हिक चौरा बाबा हेराते छठी,
आजु जमाअत सजाए गे,
संग में भूत-पिसाच बारात का, अंग में भभूति रमाए गे…
गे माई कोना बियाहब शिव बौराह गे…”
इसी तरह के एक गीत में आगे कहा गया है कि गौरा यानी पार्वती जी सुकुमारी और किशोरी रूप में सुंदर हैं जबकि भूत भावन, पतित पावन भगवान शंकर का रूप निराला हैं। वे नंग-धरंग रहते हैं और भांग की मांग के लिए बौराए रहते हैं:
गौरी हमर सुकुमारी किशोरी,
कंचन वरन सुहाए गे,
ई वर बूढ़, दिगंबर, बौराहा,
कोना ई जोरी मिलाए गे।
गे माई कोना बियाहब शिव बौराहा गे…”
उनके हाथ में डमरू है। कंधे पर झोली है. बैल पर सवार गले में विषधर को लपेटे जहाँ – तहाँ चले जाते हैं । वे जहां भी जाते हैं वहां भय का माहौल बन जाता है:
“हाथ में डमरू, कंधे पर झोली,
चढ़ल बैल पर आये गे,
कंठ में विषधर स्याना लपेटल,
देखि जियरा काँपी जाये गे।
गे मा कोना बियाहब शिव बौराह गे…”
अंत में मैथिल कवि विद्यापति जी कहते हैं:
“विद्यापति भनहि विद्यापति सुनु गे मनिने, शिव थिक त्रिभुवन नाथ गे,
मानुष रूप देखि जानु भूलहु,
गौरी के ई वर सजहु गे।
गे माई कोना बियाहब शिव बौराह गे…”
सावन माह में यहां का कण-कण भक्तिमय हो जाता है। एक अन्य मधुर गीत में महिलाएं गाती हैं:
“शंकर तीरे जटा में बहती है गंगाधारा । पाप तारे। ब्रह्मानंद न बिसारे भवसिंधु पार तारा॥”
मिथिला के लोकगीत शिव जी की भक्ति गीत से जुड़े हुए हैं। एक अन्य गीत में उनके रूप का वर्णन इस प्रकार है:
“बाघ शिष्य फिरने छठी बाबा
भाल पर त्रिपुंड लगौने
तीन उत्सव धारी शंकर
नीलकंठ कहबै छठी
कैलास के राजा भोला
भूत-प्रेत संग में डोलै
छठी नंदी गेंद पर सवारी
सागर जग के पालनहार।”
देवघर में भोले बाबा को जल चढ़ाने के लिए लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है। सावन का सलोना महीना शिव – भक्ति युक्त भक्तों से भरा हुआ है। इस महीने में काँवर महिमा का वर्णन भी देखें। चतुर्दिक शिव के जय कारे से वातावरण गुंजायमान रहता है। ऐसे पवित्र मौके पर कांवर का वर्णन अत्यंत मनोहारी हो गया है:
“बाबा बैद्यनाथ के रूप
त्रिशूलधारी, डमरूधारी
जटा से गंगा बहे छै
माथा पर जल चढ़ै छै
भक्त सब जयकार करै छै
बोल बम गूंजै छै।”
भोलेनाथ के रूप-सौंदर्य का वर्णन : मैथिली लोक गीत का मूल आधार और भक्ति ही इस का प्राण है। यही कारण है कि गौरी-शंकर के रूप-सौन्दर्य का वर्णन अनोखा और अद्वितीय बन गया है। इन लोकगीतों के रचनाशील संगीतकारों एवं कलाकारों में भक्तों के मनोभावों की मधुरता और प्रांजलता देखते ही बनती हैं:
“गौरी के साजन भोला बाबा
जटा जूटधारी शंकर
-चंद्रशेखर नाम तोहार
गंगा जटा में समौने
रुद्राक्ष के माला में
भांग धतूरा प्रिय लागै”
इस प्रकार स्पष्ट है कि ये गीत समाज शास्त्रीय विश्लेषण की दृष्टि से मनन करने योग्य हैं। इस गीत में ऊंच-नीच, साक्षर-निरक्षर, निर्धन-धनवान का कोई भेदभाव नहीं है। यह गीत सामाजिक और पारिवारिक परिवेश एवं वातावरण को समर्पित है और इसमें प्रेम, सौंदर्य, दया , करुणा एवं भक्ति को भी याद किया जाता है।
इन तस्वीरों में जीवन के सुख-दुख की हकीकत भी बताई गई है। लोकगीतों का भाव सौंदर्य बोधक है तथा समाजशास्त्रीय दृष्टि से नूतन अर्थ का सृजन करता है। जब वे यहां के वातावरण को शिव के रूप में सजाते हैं तो उन्हें मिथिला में देवताओं को देवता के रूप में भी माना जाता है। इसी तरह यहां की प्रचलित नारी लोकगीतों में शराब एक ताने का प्रतीक भी है तो माता पार्वती की तपस्या को एक का संघर्ष और “मनचाहा वर” पाने की जिद को भी बताया गया है। वहीं इन कलाकारों में “सास-ससुर का विरोध” अंतर्विरोध या प्रवेश विवाह पर समाज का विरोध भी सामने आता है और हमारी आंखें खुल जाती हैं।
इसी तरह हमारे देवता भोला-भंडारी हैं जिससे गरीब व्यक्ति को भी सम्मान की सीख मिल जाती है ताकि वह अनादर या असम्मान का पात्र न बने । गरीबी या अभाव बुरा नहीं है बल्कि अभाव या गरीबी का सामना करना भी पड़े तो हारना या घबड़ाना नहीं चाहिए । वह इस बात का भी संदेश देते हैं कि किसी भी इंसान को महंगे वस्त्र- आभूषण के फेरे में न रहकर शुद्ध भाव अपना जीवन जीना चाहिए।
श्रावण मास की सोमवारी और शिव माहात्म्य
इस साल श्रावण (सावन ) मास का आरंभ 30 जुलाई 2026 (गुरुवार) के दिन से हो रहा है । यह महीना कुल 31 दिनों का है तथा इसकी समाप्ति 28 अगस्त 2026 (शुक्रवार) पूर्णिमा के दिन होगी। सावन के दौरान पड़ने वाले सोमवारी व्रत की तिथियाँ इस प्रकार हैं:
- पहली सोमवारी — 3 अगस्त 2026
- दूसरी सोमवारी — 10 अगस्त 2026
- तीसरी सोमवारी — 17 अगस्त 2026
- चौथी सोमवारी — 24 अगस्त 2026
सावन की सोमवारी का महत्व
यह सोमवारी व्रत शिव भक्ति, श्रद्धा और प्रकृति का अद्भुत संगम है। सावन का महीना आते ही पूरा वातावरण शिवमय हो जाता है। इसलिए हिंदू धर्म में सावन महीने का विशेष महत्व है। शास्त्रों में सावन महीने को भगवान शंकर का सबसे प्रिय महीना कहा गया है।
ऐसी मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय भगवान शिव ने विष पीकर सृष्टि की रक्षा की थी। उस विष की जलन को शांत करने के लिए देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया था। तभी से सावन में शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र और धतूरा चढ़ाने की परंपरा है। मान्यता है कि सावन के सोमवार को सच्चे मन से व्रत और पूजा करने से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं।
सोमवारी का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं, वैज्ञानिक भी है। सावन में बारिश के कारण कई तरह की बीमारियां फैलती हैं। इस महीने में हल्का भोजन, फलाहार और व्रत रखने से शरीर शुद्ध होता है और रोगों से बचाव होता है। सुबह जल्दी उठकर स्नान, ध्यान और शिव आराधना से मन को शांति और ऊर्जा मिलती है।
आज के समय में जब जीवन भाग-दौड़ भरा है, सोमवारी हमें प्रकृति और ईश्वर से जुड़ने का अवसर देती है। कावड़ यात्रा, जलाभिषेक और सामूहिक पूजा से समाज में एकता और भाईचारे का भाव बढ़ता है।
अतः इस सावन महीने में प्रायः हर दिन एवं प्रत्येक सोमवारी को शिव की अवश्य आराधना करनी चाहिए । इससे जहाँ कुमारी कन्याओं को मनोवांछित वर की प्राप्ति होती है वहीं विवाहित महिलाओं को घर परिवार में सुख- शांति व समृद्धि तथा दाम्पत्य जीवन में सौहार्द व आनंद होता है। भगवान शंकर की उपासना के लिए एक लोटा जल, एक बेलपत्र और सच्ची श्रद्धा के साथ “ॐ नमः शिवाय” का जाप करें। इससे शिव का आशीर्वाद प्राप्त होकर जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाता है।
नोट: (फोटो AI जनरेटेड)

