📌 अमित मणि त्रिपाठी
देवरिया, 11 अगस्त। महर्षि देवरहा बाबा स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय में मंगलवार को नवजात शिशुओं में गंभीर बीमारियों की समय रहते पहचान को लेकर एक कार्यशाला आयोजित हुई। कॉलेज काउंसिल हॉल में हुए इस आयोजन की अध्यक्षता प्राचार्या डॉ. रजनी पटेल ने की।
नवजात स्क्रीनिंग पर कार्यशाला
कार्यशाला में सिनर्जी मेडिकल सिस्टम एलएलपी के मैनेजर शुभाशीष मैत्रा ने बताया कि नवजात शिशुओं में कई गंभीर बीमारियां ऐसी होती हैं जिनके लक्षण जन्म के समय स्पष्ट रूप से नजर नहीं आते। उन्होंने कहा कि अगर इनकी पहचान और इलाज समय पर न हो तो बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास पर बुरा असर पड़ सकता है। इसी वजह से न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग को शिशुओं के स्वस्थ भविष्य के लिए बेहद जरूरी जांच बताया गया।
विशेषज्ञों ने बताया कि प्रारंभिक स्क्रीनिंग से संभावित बीमारी का पता चलने पर समय रहते जरूरी पुष्टिकरण जांच और उपचार शुरू किया जा सकता है, जिससे गंभीर जटिलताओं को रोकने में मदद मिलती है। यह भी स्पष्ट किया गया कि स्क्रीनिंग का असामान्य परिणाम अंतिम निदान नहीं होता, बल्कि ऐसे मामलों में डॉक्टर की सलाह पर आगे की पुष्टिकरण जांच जरूरी होती है।
डीबीएस तकनीक से होगी जांच
कार्यशाला में ड्राइड ब्लड स्पॉट (डीबीएस) तकनीक की जानकारी दी गई, जिसमें नवजात शिशु की एड़ी या उंगली से रक्त की कुछ बूंदें लेकर फिल्टर पेपर पर संग्रहित की जाती हैं और उसी आधार पर विभिन्न बीमारियों की जांच की जाती है। इस तकनीक से कॉन्जेनाइटल हाइपोथायरायडिज्म, कॉन्जेनाइटल एड्रेनल हाइपरप्लासिया तथा जी सिक्स पीडी डेफिशिएंसी जैसी बीमारियों की पहचान संभव है।
इसके अलावा गैलेक्टोसीमिया, फेनिलकीटोन्यूरिया, मेपल सिरप यूरिन डिजीज, सिस्टिक फाइब्रोसिस तथा बायोटिनिडेज डेफिशिएंसी जैसी जन्मजात और मेटाबोलिक बीमारियों की भी इसी तकनीक से पहचान की जा सकती है। बताया गया कि डीबीएस आधारित स्क्रीनिंग में एलिसा और एंजाइमेटिक कलरिमेट्रिक जैसी प्रयोगशाला तकनीकों का इस्तेमाल होता है। कार्यशाला का मुख्य संदेश रहा, “समय पर जांच, समय पर पहचान, स्वस्थ बचपन की मजबूत नींव।”
कार्यशाला में रहे मौजूद
इस मौके पर प्राचार्या डॉ. रजनी पटेल के अलावा डॉ. श्वेता सिंह, डॉ. बबीता कपूर, डॉ. आरके श्रीवास्तव, डॉ. संजय भट्ट, डॉ. इकबाल, डॉ. अनीता, डॉ. विवेक कुशवाहा और डॉ. विकास मदेशिया मौजूद रहे। महाविद्यालय की ओर से कहा गया कि इस तरह की कार्यशालाएं नवजात शिशुओं की बेहतर स्वास्थ्य देखभाल और समय रहते बीमारियों की पहचान के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल हैं।

