लखनऊ। उत्तर प्रदेश की 57,694 ग्राम पंचायतों का पाँच साल का कार्यकाल आज 26 मई 2026 को समाप्त हो रहा है। योगी आदित्यनाथ सरकार ने 25 मई को एक ऐतिहासिक आदेश जारी करते हुए तय किया है कि कल 27 मई 2026 से मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक के रूप में नियुक्त किया जाएगा। यह व्यवस्था अधिकतम 6 महीने तक या 2027 के विधानसभा चुनाव के बाद पंचायत चुनाव होने तक लागू रहेगी। प्रमुख सचिव अनिल कुमार ने इस आशय का कार्यालय ज्ञाप जारी किया है।
सरकारी आदेश में क्या है?
पंचायती राज अनुभाग-3, उत्तर प्रदेश शासन की ओर से 25 मई 2026 को कार्यालय ज्ञाप संख्या 33-3099/105/2026 जारी किया गया। यह आदेश प्रमुख सचिव अनिल कुमार के डिजिटल हस्ताक्षर से जारी हुआ। आदेश में उ०प्र० पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा-12 की उपधारा-(3)(क) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया गया है कि जहाँ अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण ग्राम पंचायत के कार्यकाल के अवसान के पूर्व निर्वाचन कराना संभव नहीं है — वहाँ राज्य सरकार प्रशासनिक समिति या प्रशासक नियुक्त कर सकती है। इसी प्रावधान के तहत निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने का निर्णय लिया गया है।
आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि 27 मई 2026 से निवर्तमान ग्राम प्रधानों को सामान्य (रूटीन) कार्यों के निर्वहन हेतु संबंधित जिले के जिलाधिकारी को प्राधिकृत किया जाएगा। प्रशासक द्वारा कोई नीति विषयक निर्णय नहीं लिया जाएगा। यदि किसी अत्यावश्यक या विशेष परिस्थिति में नीतिगत फैसला जरूरी हो तो प्रस्ताव जिला पंचायत राज अधिकारी के माध्यम से जिलाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत कर स्वीकृति प्राप्त की जाएगी। आदेश की प्रतिलिपि प्रमुख स्टाफ आफिसर मुख्य सचिव और कृषि उत्पादन आयुक्त समेत सभी संबंधित विभागों को भेजी गई है।
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पहले क्या होता था — अब क्या बदला?
अब तक UP में पंचायत चुनाव में देरी होने पर ADO पंचायत (सहायक विकास अधिकारी) को प्रशासक नियुक्त किया जाता था और वे चुनाव होने तक गाँव के विकास कार्यों की देखरेख करते थे। लेकिन इस बार राष्ट्रीय पंचायती राज ग्राम प्रधान संघ ने CM योगी आदित्यनाथ से सीधे माँग की थी कि ADO पंचायत की जगह मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक नियुक्त किया जाए। सरकार ने यह माँग मान ली और CM योगी ने पंचायती राज विभाग के प्रस्ताव को स्वयं अनुमोदित किया। यह व्यवस्था राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड में पहले भी अपनाई जा चुकी है — लेकिन UP में यह पहली बार हो रहा है।
प्रशासक के रूप में प्रधान केवल रूटीन (सामान्य) कार्य ही कर सकेंगे — नीति विषयक कोई भी निर्णय लेने का अधिकार उन्हें नहीं होगा। ऐसे मामलों में जिला पंचायत राज अधिकारी के माध्यम से जिलाधिकारी की स्वीकृति लेनी होगी। 6 महीने की अवधि समाप्त होने से पहले यदि पंचायत चुनाव हो जाते हैं तो यह व्यवस्था स्वतः खत्म हो जाएगी। हालाँकि मुजफ्फरनगर समेत कुछ जिलों में विपक्षी संगठनों ने इस फैसले पर तत्काल रोक लगाने की माँग की है — उनका कहना है कि इससे गाँव का लोकतंत्र कमजोर होता है।
पंचायत चुनाव क्यों नहीं हो पाए?
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव टलने की जड़ में सुप्रीम कोर्ट का Triple Test है। शीर्ष अदालत के निर्देशानुसार किसी भी स्थानीय निकाय चुनाव में OBC आरक्षण लागू करने से पहले एक समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग बनाना अनिवार्य है। इस आयोग को पिछड़े वर्ग की आबादी, उनकी पिछड़ेपन की स्थिति और आरक्षण की जरूरत का वैज्ञानिक आकलन करना होता है — तभी सीटों का आरक्षण तय हो सकता है। UP में पिछले OBC आयोग का कार्यकाल पहले ही समाप्त हो चुका था और नया आयोग अभी तक नहीं बन पाया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस देरी पर सख्त रुख अपनाते हुए पंचायती राज विभाग के प्रमुख सचिव अनिल कुमार को अवमानना नोटिस जारी किया। जस्टिस सौरभ लवानिया की एकल पीठ में अधिवक्ता मोतीलाल यादव की अवमानना याचिका पर सुनवाई हुई जिसमें आरोप लगाया गया कि 4 फरवरी 2026 की सुनवाई में राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को भरोसा दिया था कि पंचायत चुनाव से पहले पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन हो जाएगा — लेकिन यह वादा पूरा नहीं हुआ। हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा — “आयोग का गठन आखिर कब तक होगा?” पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर पहले कहते रहे कि चुनाव समय पर होंगे — लेकिन अंततः सरकार को देरी स्वीकार करनी पड़ी। इसके अलावा मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन भी 10 जून तक होने की संभावना है।
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कानून क्या कहता है?
पंचायती राज विभाग के निदेशक अमित सिंह ने स्पष्ट किया है कि उ०प्र० पंचायत राज अधिनियम, 1947 में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाने का कोई प्रावधान नहीं है। अधिनियम की धारा-12 की उपधारा-(3)(क) के अनुसार कोई भी ग्राम पंचायत अपनी प्रथम बैठक से 5 वर्ष तक ही बनी रह सकती है — उससे अधिक नहीं। उपधारा-(4) में यह भी स्पष्ट है कि ग्राम पंचायत के किसी भी सदस्य का कार्यकाल ग्राम पंचायत के कार्यकाल के साथ स्वतः समाप्त हो जाएगा।
यही कारण है कि 26 मई के बाद ग्राम प्रधानों की समस्त शक्तियाँ, कृत्य और कर्तव्य कानूनी रूप से समाप्त हो जाएंगे — चाहे चुनाव हों या न हों। संविधान के अनुच्छेद 243-E के तहत भी पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता। यही वजह है कि सरकार के पास प्रशासक नियुक्त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। 27 मई से प्रधान भले ही प्रशासक के रूप में वही काम करते दिखें — लेकिन कानूनी दृष्टि से उनका दर्जा निर्वाचित जनप्रतिनिधि का नहीं रहेगा। उनके पास पीएम आवास योजना, मनरेगा, स्वच्छ भारत अभियान जैसी केंद्रीय योजनाओं के संचालन की जिम्मेदारी तो रहेगी — लेकिन कोई भी बड़ा या नीतिगत निर्णय लेने का अधिकार नहीं होगा।
2027 विधानसभा के बाद होंगे पंचायत चुनाव
सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि UP में त्रि-स्तरीय पंचायत चुनाव — यानी ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत — 2027 के विधानसभा चुनाव के बाद ही होंगे। UP विधानसभा चुनाव फरवरी-मार्च 2027 में होने की संभावना है।
पंचायत चुनाव की राह अभी भी लंबी है। CM योगी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में “समर्पित राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग” के गठन को मंजूरी दी गई है। अब यह आयोग पूरे UP के जिलों में OBC आबादी का सर्वे और वैज्ञानिक आकलन करेगा — इसके आधार पर पंचायत सीटों का आरक्षण तय होगा। इस पूरी प्रक्रिया में कम से कम 6 महीने लगने का अनुमान है। इसके बाद आरक्षण सूची अंतिम करने और चुनाव कराने में 3 से 4 महीने और लगेंगे। यानी वास्तविक मतदान 2027 के मध्य या उत्तरार्ध से पहले संभव नहीं दिखता। इसका सीधा मतलब है कि प्रदेश के लाखों गाँवों में डेढ़ साल से अधिक समय तक निर्वाचित प्रतिनिधि की जगह प्रशासक ही काम करते रहेंगे।
