नई दिल्ली। यह महज एक ऊर्जा संकट नहीं — यह भारत के तेल मानचित्र का ऐतिहासिक पुनर्लेखन है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते उत्पन्न संकट ने भारत को अपने तेल आपूर्ति स्रोतों की पूरी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। नतीजा — हजारों किलोमीटर दूर बैठा वेनेज़ुएला अचानक भारत का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का आपूर्तिकर्ता बन गया है। और इसका सीधा असर पड़ रहा है — देश के उस आम नागरिक पर जो आज पेट्रोल पंप पर ₹99.51 प्रति लीटर चुका रहा है।
होर्मुज़ बंद — भारत का आधा तेल रुका
होर्मुज़ जलडमरूमध्य वह संकरा समुद्री रास्ता है जिससे दुनिया का 20 प्रतिशत और भारत का 52 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता था। अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते यह मार्ग व्यावहारिक रूप से बंद हो चुका है। इराक और सऊदी अरब से आने वाली आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। सऊदी अरब से भारत का आयात अप्रैल में 6,70,000 बैरल प्रतिदिन था — जो मई में लगभग आधा होकर 3,40,000 बैरल प्रतिदिन पर आ गया।
इतना ही नहीं — अप्रैल में भारत ने सात साल बाद ईरान से तेल आयात शुरू किया था — लेकिन अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी के कारण मई में फिर बंद हो गया। होर्मुज़ के पास भारत से जुड़े कई जहाज हमलों का शिकार हुए — एक भारतीय झंडे वाला जहाज ओमानी जलक्षेत्र में ड्रोन या मिसाइल हमले के बाद डूब गया।
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वेनेज़ुएला — नया तेल मित्र!
जब पारंपरिक रास्ते बंद हुए तो भारत ने अपनी निगाहें लैटिन अमेरिका की तरफ घुमाईं। वेनेज़ुएला — जिसके पास दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल के भंडार हैं — 303 अरब बैरल, यानी वैश्विक कुल का 17 प्रतिशत — अचानक भारत के लिए जीवनरेखा बन गया।
ऊर्जा ट्रैकिंग फर्म Kpler के आँकड़ों के अनुसार मई 2026 में भारत ने वेनेज़ुएला से 4,17,000 बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल का आयात किया — जो अप्रैल की तुलना में 50 प्रतिशत अधिक है। पिछले नौ महीनों से भारत ने वेनेज़ुएला से तेल नहीं लिया था। इस माह रूस और UAE के बाद वेनेज़ुएला तीसरे स्थान पर आ गया — सऊदी अरब और अमेरिका दोनों को पीछे छोड़ते हुए।
वेनेज़ुएला के इस उभार के पीछे एक और कारण है — जनवरी 2026 में अमेरिकी बलों ने वहाँ के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हटा दिया — जिसके बाद अमेरिका ने वेनेज़ुएला के तेल को वैश्विक बाजार में धकेलना शुरू किया।
Marco Rubio की भारत यात्रा — तेल कूटनीति का नया अध्याय
अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio इन दिनों 23 से 26 मई तक भारत के दौरे पर हैं। उनकी यात्रा का एजेंडा व्यापक है — ऊर्जा सुरक्षा, द्विपक्षीय व्यापार और रक्षा सहयोग इसके केंद्र में हैं। रूबियो ने इस दौरान भारत को अमेरिकी तेल की पेशकश करते हुए स्पष्ट किया कि वाशिंगटन भारत को उसकी जरूरत के अनुसार जितना तेल चाहिए उतना देने को तैयार है। उन्होंने वेनेज़ुएला के तेल को भी इस ऊर्जा समीकरण में शामिल करने का संकेत दिया। दूसरी तरफ वेनेज़ुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज़ भी अगले हफ्ते भारत दौरे पर आने वाली हैं — जो इस नई ऊर्जा कूटनीति को और गहरा करेगा।
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भारत की रणनीति — विविधीकरण
भारत सरकार ने मार्च 2026 में ही स्पष्ट किया था कि देश के पास छह हफ्तों का कच्चा तेल भंडार है और होर्मुज़ से न गुजरने वाले वैकल्पिक स्रोतों तक पहुँच है। भारत अब रूस, अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका और वेनेज़ुएला से आयात बढ़ा रहा है। मई में भारत का कुल कच्चा तेल आयात 4.9 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहा — अप्रैल की तुलना में 8 प्रतिशत अधिक।
हालाँकि यह रास्ता उतना आसान नहीं है। वेनेज़ुएला का भारी किस्म का कच्चा तेल हर रिफाइनरी में परिष्कृत नहीं किया जा सकता। इसके लिए अत्यंत उन्नत और जटिल रिफाइनिंग क्षमता की जरूरत होती है — जो भारत में केवल कुछ चुनिंदा रिफाइनरियों के पास है। इनमें सबसे प्रमुख है गुजरात के जामनगर में रिलायंस इंडस्ट्रीज की रिफाइनरी। इसलिए वेनेज़ुएला से आयात बढ़ाने की एक स्वाभाविक सीमा है — और यह विकल्प दीर्घकालिक समाधान नहीं बल्कि अभी के लिए एक रणनीतिक राहत मात्र है।
आम आदमी पर असर — कब मिलेगी राहत?
यह सारी कूटनीति और रणनीति अंततः उस ₹99.51 में सिमट जाती है जो आज दिल्ली में पेट्रोल पंप पर चुकाना पड़ रहा है। 15 मई से अब तक 10 दिनों में तीन बार पेट्रोल-डीजल महंगा हो चुका है — कुल ₹5 प्रति लीटर की बढ़ोतरी।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक होर्मुज़ पर स्थिति सामान्य नहीं होती — राहत की उम्मीद कम है। वैकल्पिक आपूर्ति से उपलब्धता तो सुनिश्चित हो सकती है — लेकिन सस्ताई नहीं। लंबे समुद्री रास्ते, ऊँचे बीमा शुल्क और महंगे कच्चे तेल की मार आम नागरिक की जेब पर पड़ती रहेगी।
