नई दिल्ली। अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो 23 मई 2026 को भारत की पहली आधिकारिक यात्रा पर आ रहे हैं। 26 मई तक चलने वाले इस दौरे में वे कोलकाता, आगरा, जयपुर और नई दिल्ली का भ्रमण करेंगे। अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार यह यात्रा ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और रक्षा सहयोग पर केंद्रित रहेगी। दिल्ली में विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ द्विपक्षीय वार्ता होगी और 26 मई को Quad विदेश मंत्रियों की बैठक में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया एक साथ बैठेंगे।
रूबियो क्यों आ रहे हैं — असली वजह क्या है
यह दौरा महज एक औपचारिक यात्रा नहीं है। वैश्विक राजनीति इस समय कई मोर्चों पर एक साथ उबल रही है — ईरान-अमेरिका तनाव, इंडो-पैसिफिक में चीन की बढ़ती गतिविधियां, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में अस्थिरता। ऐसे में अमेरिका चाहता है कि भारत इस जटिल भू-राजनीतिक समीकरण में उसके साथ खड़ा हो। भारत दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति है — और अमेरिका के लिए यह दौरा एक रणनीतिक निवेश है।
ईरान-अमेरिका तनाव में भारत कहां खड़ा है
ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु विवाद को लेकर तनाव चरम पर है। अमेरिका ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। भारत ऐतिहासिक रूप से ईरान से तेल खरीदता रहा है — जिसे लेकर अमेरिका ने पहले ही भारत पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क लगाने की चेतावनी दी थी। रूबियो की इस यात्रा में भारत को ईरान से दूरी बनाने और अमेरिकी ऊर्जा स्रोतों की ओर रुख करने पर दबाव डाला जा सकता है। लेकिन भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की नीति इसे आसान नहीं बनाती — भारत हमेशा संतुलन की राह पर चलता रहा है।
Quad और चीन — भारत की अहम भूमिका
Quad यानी भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का चतुर्भुज सुरक्षा संवाद — यह चीन की बढ़ती समुद्री शक्ति के जवाब में सबसे अहम मंच बन चुका है। 26 मई को होने वाली Quad बैठक में इंडो-पैसिफिक में स्थिरता, समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने पर चर्चा होगी। अमेरिका चाहता है कि Quad को और ताकतवर बनाया जाए — और भारत इसमें नेतृत्व की भूमिका निभाए। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और विदेश मंत्री मार्को रूबियो दोनों चीन की यात्रा पर गए थे — जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा।
अमेरिका और चीन के बीच हुई बातचीत के नतीजे पूरी दुनिया को प्रभावित करते हैं — और भारत भी इससे अछूता नहीं है। खासकर Quad के संदर्भ में — अगर वाशिंगटन और बीजिंग के बीच कोई नई समझ बनी है तो उसका सीधा असर भारत-अमेरिका सहयोग पर भी पड़ेगा। इसीलिए यह यात्रा भारत के लिए सिर्फ एक सामान्य मुलाकात नहीं — बल्कि वैश्विक पटल पर अपनी स्थिति को समझने का भी मौका है।
व्यापार और रक्षा — दो बड़े मुद्दे
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर कई महीनों से बातचीत जारी है — लेकिन अभी तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर टैरिफ बढ़ाए हैं और भारत ने भी जवाबी कदम उठाने की चेतावनी दी है। दोनों देश जल्द व्यापार समझौते की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं — रूबियो की यात्रा इस दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकती है। रक्षा के मोर्चे पर GE-414 जेट इंजन, MQ-9B ड्रोन और अन्य सौदों पर बातचीत चल रही है — इस यात्रा में कुछ समझौतों को अंतिम रूप मिल सकता है। भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है और यह यात्रा उसे नई ऊंचाई देगी।
कोलकाता, आगरा, जयपुर — सिर्फ पर्यटन नहीं
दिल्ली के अलावा कोलकाता, आगरा और जयपुर का दौरा असामान्य है — आमतौर पर विदेश मंत्री सिर्फ राजधानी में बैठकें करते हैं। कोलकाता का दौरा पूर्वी भारत और बंगाल की खाड़ी के रणनीतिक महत्व को रेखांकित करता है — जो इंडो-पैसिफिक की दृष्टि से बेहद अहम है। यहां रूबियो मदर टेरेसा से जुड़े स्थलों का दौरा भी कर सकते हैं — जो भारत-अमेरिका के बीच सांस्कृतिक और मानवीय जुड़ाव का प्रतीक होगा। आगरा और जयपुर का दौरा भारतीय संस्कृति और विरासत से जुड़ाव का प्रतीक है। इससे साफ है कि अमेरिका भारत की विविधता और क्षेत्रीय महत्व को समझना चाहता है — और यह दिखाना चाहता है कि उसकी नजर सिर्फ दिल्ली पर नहीं बल्कि पूरे भारत पर है।
