गाज़ीपुर। इस बार खरीफ सीजन में संभावित कम वर्षा और लगातार गिरते भूजल स्तर को देखते हुए गाज़ीपुर जिला प्रशासन ने अभी से मोर्चा संभाल लिया है। गुरुवार को विकास भवन सभागार में मुख्य विकास अधिकारी आलोक प्रसाद की अध्यक्षता में कृषि, सिंचाई, नलकूप, पशुपालन और उद्यान विभाग के अधिकारियों की संयुक्त समीक्षा बैठक हुई। बैठक में सूखे की चुनौती से निपटने के लिए व्यापक कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए गए। इसी दिन जिला कृषि अधिकारी उमेश कुमार ने बताया कि इस वर्ष जनपद में 1,29,532 हेक्टेयर में धान बोआई का लक्ष्य है और इसे पूरा करने के लिए कृषि विभाग की टीमें गांव-गांव जाकर किसानों को DSR तकनीक की जानकारी दे रही हैं।
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पानी और पैसे दोनों की बचत
पारंपरिक धान की खेती में पहले नर्सरी तैयार करनी पड़ती है, फिर खेत में पानी भरकर मजदूरों से रोपाई करानी होती है। इस पूरी प्रक्रिया में पानी और मजदूरी दोनों पर भारी खर्च आता है। DSR यानी डायरेक्ट सीडेड ऑफ राइस तकनीक में धान के बीज सीधे खेत में बोए जाते हैं। इसमें खेत में हर समय पानी भरकर रखने की जरूरत नहीं पड़ती।
जिला कृषि अधिकारी उमेश कुमार के अनुसार DSR तकनीक से 50 से 60 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है। नर्सरी और रोपाई की मजदूरी का खर्च भी बचता है। इससे भी बड़ा फायदा यह है कि DSR तकनीक से बोई गई धान की फसल सात से दस दिन पहले पककर तैयार हो जाती है — जिससे किसानों को अगली फसल की तैयारी के लिए अतिरिक्त समय मिलता है।
कृषि विभाग ने किसानों को एक जरूरी सलाह भी दी है — DSR तकनीक में शुरुआती दिनों में खेत अपेक्षाकृत सूखा रहता है जिससे खरपतवार उगने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए समय से पेंडीमेथालिन (Pendimethalin) खरपतवार नाशक का छिड़काव जरूरी है। जनपद के राजकीय कृषि बीज गोदामों पर पर्याप्त मात्रा में बीज उपलब्ध करा दिए गए हैं।
दलहनी फसलें और नलकूप पर फोकस
मुख्य विकास अधिकारी आलोक प्रसाद की अध्यक्षता में हुई बैठक में उपनिदेशक कृषि, जिला कृषि अधिकारी, भूमि संरक्षण अधिकारी, मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी, जिला उद्यान अधिकारी, सिंचाई एवं नलकूप विभाग के अभियंता और अग्रणी जिला प्रबंधक उपस्थित रहे। बैठक में निर्देश दिया गया कि जनपद में बीज और सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
धान की परंपरागत खेती का रकबा कम करते हुए कम अवधि वाली धान की किस्मों को बढ़ावा दिया जाए। इसके साथ अरहर, उड़द और मूंग जैसी दलहनी फसलें — जो कम पानी में तैयार हो जाती हैं — का रकबा बढ़ाने पर जोर दिया गया। नहरों की टेल फीडिंग सुनिश्चित करने और राजकीय व निजी नलकूपों को हर हाल में क्रियाशील रखने के निर्देश भी दिए गए।
CDO आलोक प्रसाद ने कहा — “संभावित सूखे की स्थिति को देखते हुए सभी विभाग समन्वय बनाकर कार्य करें। किसानों को कम पानी वाली फसलों और DSR तकनीक के प्रति जागरूक किया जाए तथा सिंचाई एवं पशु चारे की पर्याप्त व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।”
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चारे और भूसे की व्यवस्था के निर्देश
संभावित सूखे का असर सिर्फ फसलों पर नहीं — पशुओं पर भी पड़ सकता है। इसे ध्यान में रखते हुए बैठक में पशुपालन विभाग को निर्देश दिया गया कि पशुओं के लिए हरे चारे और भूसे की पर्याप्त व्यवस्था पहले से सुनिश्चित की जाए।
किसानों को राहत देने के लिए कई उपाय भी चर्चा में रहे — फसल क्षति पर मुआवजा, कृषि ऋण पुनर्गठन, अनुदानित बीज वितरण, डीजल और सिंचाई अनुदान, कृषि बिजली बिलों में राहत, मनरेगा के तहत अतिरिक्त रोजगार और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ। पेयजल की विशेष व्यवस्था का भी प्रावधान किया जाएगा। प्रशासन की यह तैयारी संकेत देती है कि इस बार सूखे की स्थिति आने से पहले ही हर स्तर पर इंतजाम किए जा रहे हैं।

