छात्रों का बढ़ता असंतोष पिछले कुछ समय से लगातार देश की सुर्खियों में है। दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर झारखंड की सड़कों और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के स्कूलों तक छात्र अपनी-अपनी समस्याओं को लेकर आवाज उठा रहे हैं। कहीं परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल हैं, कहीं भर्ती प्रक्रिया को लेकर नाराजगी है और कहीं छोटे बच्चे शिक्षक, पानी, शौचालय व दूसरी बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि छात्र आखिर इतने गुस्से में क्यों हैं और अलग-अलग जगहों पर उठ रही ये आवाजें एक ही समय में इतनी तेज क्यों सुनाई दे रही हैं?
संसद मार्च और पुलिस कार्रवाई भी हुई
दिल्ली का जंतर-मंतर इस छात्र आंदोलन का सबसे बड़ा केंद्र बनकर सामने आया। परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के सवालों से शुरू हुआ विरोध धीरे-धीरे शिक्षा व्यवस्था और जवाबदेही के बड़े मुद्दे में बदल गया। आंदोलन कई हफ्तों तक चला। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की और पुलिस के साथ टकराव की स्थिति भी बनी। 20 जुलाई को संसद की ओर मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई में कई प्रदर्शनकारियों के घायल होने की खबर सामने आई।
छात्रों की मांगों के समर्थन में पर्यावरणविद सोनम वांगचुक भी इस आंदोलन से जुड़े और उन्होंने 26 दिन तक भूख हड़ताल की। उनके अनशन ने छात्रों की मांगों को लेकर चल रहे विरोध को और व्यापक समर्थन दिलाया। आंदोलन के दौरान छात्रों और युवाओं का प्रदर्शन जारी रहा। आखिरकार 25 जुलाई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद प्रदर्शन वापस लेने की घोषणा की गई। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार जंतर-मंतर का यह आंदोलन 49 दिन तक चला।
यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां छात्रों का विरोध केवल परीक्षा के परिणाम तक सीमित नहीं रहा। जब हजारों युवा लंबे समय तक सड़क पर रहें, संसद की ओर मार्च करें और आंदोलन का असर केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय तक पहुंचे, तो यह समझना जरूरी हो जाता है कि उनके भीतर सिर्फ तत्काल नाराजगी नहीं, बल्कि व्यवस्था पर भरोसे को लेकर भी सवाल मौजूद हैं।
झारखंड के आंदोलन में सरकार का बड़ा फैसला
झारखंड में JSSC-CGL परीक्षा और दूसरी भर्ती परीक्षाओं को लेकर छात्रों का आंदोलन भी लंबे समय तक चला। रांची में करीब 24 दिन तक चले इस आंदोलन में परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता और कथित गड़बड़ियों की जांच की मांग उठाई गई। आंदोलन के दौरान छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो भूख हड़ताल पर बैठे। उन्होंने 16 दिन तक अनशन किया। उनके साथ दो अन्य प्रदर्शनकारी भी भूख हड़ताल पर थे।
17 अगस्त को झारखंड सरकार ने JSSC-CGL 2024 परीक्षा रद्द करने और TDPL से जुड़ी 2014 से कराई गई परीक्षाओं, परिणामों और चयन प्रक्रियाओं को निरस्त करने का फैसला लिया। इसके बाद देवेंद्र नाथ महतो ने अपनी भूख हड़ताल समाप्त की।
लेकिन इस फैसले के साथ एक दूसरा सवाल भी पैदा होता है। जिस प्रक्रिया को लेकर छात्र आंदोलन कर रहे थे, उसे रद्द करने का असर उन उम्मीदवारों पर भी पड़ता है जिन्होंने उसी प्रक्रिया में परीक्षा पास की या नियुक्ति हासिल की। यानी परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी का समाधान भी आसान नहीं है। सरकार के सामने एक तरफ आंदोलन कर रहे अभ्यर्थियों का भरोसा बहाल करने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ उन लोगों के हितों की रक्षा करने की जिम्मेदारी भी है जो चयन प्रक्रिया का हिस्सा रहे हैं।
मांग अब नौकरी नहीं बुनियादी शिक्षा की है
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अलग पहलू स्कूल जाने वाले बच्चों का प्रदर्शन है। Gen Alpha के नाम से पहचानी जाने वाली इस पीढ़ी के बच्चों ने उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में स्कूल की बुनियादी सुविधाओं को लेकर प्रदर्शन किए हैं। उनकी मांगों में शिक्षक, साफ पानी, काम करने वाले पंखे, शौचालय, फर्नीचर और बेहतर स्कूल ढांचे जैसी जरूरतें शामिल हैं।
उत्तर प्रदेश में हाल के दिनों में इसकी कई तस्वीरें सामने आई हैं। लखनऊ में 18 अगस्त को करीब 250 छात्राओं ने शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं को लेकर लगभग 2.5 किलोमीटर मार्च किया। उसी दिन आजमगढ़ में छात्रों ने रसायन विज्ञान के शिक्षक की कमी, फीस बढ़ोतरी और अन्य संस्थागत समस्याओं को लेकर कक्षाओं का बहिष्कार कर प्रदर्शन किया। मध्य प्रदेश के उज्जैन में भी Gen Z और Gen Alpha छात्राओं ने स्कूल को दूसरी जगह स्थानांतरित किए जाने के विरोध में कलेक्टर कार्यालय का घेराव किया।
यहां कहानी और दिलचस्प हो जाती है। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा युवा अपने करियर को लेकर सवाल उठा रहा है, भर्ती परीक्षा का अभ्यर्थी चयन प्रक्रिया पर भरोसा मांग रहा है और स्कूल का बच्चा यह पूछ रहा है कि उसके स्कूल में शिक्षक या पंखा क्यों नहीं है। उम्र और मांगों में फर्क है, लेकिन तीनों जगह शिक्षा व्यवस्था ही केंद्र में है।
क्या सोशल मीडिया ने गुस्से को फैलाया?
यह कहना आसान है कि सोशल मीडिया की वजह से छात्र आंदोलन तेजी से फैल रहे हैं। इसमें कुछ सच्चाई जरूर है। आज किसी एक शहर में हुआ प्रदर्शन कुछ ही घंटों में दूसरे राज्यों के छात्रों तक पहुंच जाता है। जंतर-मंतर का आंदोलन देश के दूसरे हिस्सों में चर्चा का विषय बना और Gen Alpha के स्थानीय स्कूल आंदोलनों की तस्वीरें भी दूसरे राज्यों तक पहुंचीं। लेकिन केवल सोशल मीडिया को इन प्रदर्शनों का कारण मानना सही नहीं होगा। सोशल मीडिया किसी समस्या को पैदा नहीं करता, वह उसे ज्यादा लोगों तक पहुंचाता है।
असल सवाल उन समस्याओं का है जो पहले से मौजूद हैं। परीक्षा देने वाले छात्रों के लिए सालों की मेहनत के बाद परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल उठना गंभीर बात है। भर्ती की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए परीक्षा और नियुक्ति प्रक्रिया में अनिश्चितता उनके पूरे भविष्य को प्रभावित कर सकती है। वहीं छोटे बच्चों के लिए शिक्षक और शौचालय जैसी सुविधाएं किसी बड़े राजनीतिक मुद्दे का हिस्सा नहीं, बल्कि पढ़ाई की बुनियादी जरूरत हैं।
अलग-अलग मांग, लेकिन सवाल शिक्षा का
शायद इसलिए इन सभी प्रदर्शनों को केवल एक-दूसरे की नकल मानना ठीक नहीं होगा। दिल्ली का छात्र परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठा रहा है, झारखंड का अभ्यर्थी भर्ती प्रक्रिया में भरोसा चाहता है और स्कूल का बच्चा अपने क्लासरूम में पढ़ने लायक माहौल मांग रहा है।
तो फिर यह विरोध अचानक कहां से आया? शायद इसका जवाब “अचानक” में ही नहीं है। अलग-अलग जगहों पर असंतोष पहले से मौजूद था। फर्क सिर्फ इतना है कि अब छात्र उसे दबाकर रखने के बजाय खुलकर सामने ला रहे हैं।
और यही वह सवाल है जिस पर सरकारों और शिक्षा संस्थानों को गंभीरता से सोचना होगा, अगर छात्रों को अपनी परीक्षा, नौकरी और स्कूल की बुनियादी सुविधाओं के लिए बार-बार सड़क पर उतरना पड़ रहा है, तो समस्या सिर्फ प्रदर्शन में नहीं, उन परिस्थितियों में भी है जो इन प्रदर्शनों को जन्म दे रही हैं।

