मुज़फ्फरनगर। यूपी की मुज़फ्फरनगर लोकसभा सीट किसान आंदोलन के चलते सुर्खियों में रही है। यह जाटों का बेल्ट क्षेत्र माना जाता है। जाटों की सबसे बड़ी पंचायत सर्वखाप का केंद्र सोलन इसी लोकसभा का हिस्सा है। इसीलिए मुज़फ्फरनगर जाटलैंड की पहचान से सीधे जुड़ता है।
हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि जाटों के अगुआ कहलाने वाले नेता यहां सफल नहीं हो सके। किसान यूनियन की राजनीति करने वाले चेहरों की सियासी पारी भी कभी नहीं चली। इस सीट से 5 बार जाट चेहरे संसद पहुंचे और पांचों बार भाजपा के टिकट पर।
2013 के दंगे ने बदला समीकरण
2013 के दंगे के बाद पश्चिमी यूपी का सियासी समीकरण पूरी तरह बदल गया। इस दंगे ने हिंदू-मुस्लिम और जाट-मुस्लिम के बीच की खाई को और गहरा किया। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का असर इतना गहरा था कि इसने पूरे क्षेत्र की राजनीति की दिशा ही बदल दी। जो जाट पहले मुस्लिमों के साथ मिलकर वोट करते थे, वे अब अलग-अलग खेमों में बंट गए। नतीजतन गुड़ के इस शहर के मतदाता मोदी लहर के साथ बहने लगे। भाजपा ने इस ध्रुवीकरण का पूरा फायदा उठाया और 2014 से लेकर अब तक यहां अपनी पकड़ बनाए हुए है।
इस बार भाजपा ने संजीव कुमार बालियान पर तीसरी बार दांव लगाया है। वहीं इंडिया गठबंधन में सपा ने हरेंद्र सिंह मलिक को उतारा है। इसके अलावा बसपा की ओर से दारा सिंह प्रजापति मैदान में हैं। तीनों उम्मीदवारों के बीच मुकाबला कांटे का रहने की उम्मीद है।
2019 और 2014 के चुनाव परिणाम
2019 का चुनाव बेहद रोमांचक रहा। बालियान ने रालोद प्रमुख चौधरी अजित सिंह को महज 6,526 वोट से हराया। बालियान को 5,73,780 और अजित सिंह को 5,67,254 वोट मिले। यह मुकाबला इतना करीबी था कि आखिरी वक्त तक नतीजे का अनुमान लगाना मुश्किल था। उस चुनाव में रालोद का सपा-बसपा से गठबंधन था। इसके बावजूद भाजपा ने जीत हासिल की।
2014 का चुनाव अलग तस्वीर पेश करता है। उस साल मोदी लहर चरम पर थी। बालियान ने बसपा के कादिर राणा को 4,01,150 वोट के बड़े अंतर से हराया। बालियान को 6,53,391 वोट मिले। राणा को 2,52,241 वोट मिले। सपा के चौधरी वीरेंद्र सिंह को 1,60,810 और कांग्रेस के पंकज अग्रवाल को महज 12,937 वोट मिले। दोनों चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि 2019 में विपक्षी एकता ने भाजपा को कड़ी चुनौती दी थी।
लोकसभा क्षेत्र का परिचय
- मुज़फ्फरनगर लोकसभा का निर्वाचन संख्या 03 है
- इसमें 5 विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं — खतौली, बुढ़ाना, चरथावल, मुज़फ्फरनगर (मुज़फ्फरनगर जिला) और सरधना (मेरठ जिला)
- यह सीट 1952 में अस्तित्व में आई
- कुल मतदाता — 18,16,284
- पुरुष मतदाता — 9,68,265
- महिला मतदाता — 8,47,875
- 2019 में 68.20% मतदान हुआ
- वर्तमान में 5 सीटों में से 1 पर भाजपा, 2 पर सपा और 2 पर रालोद के विधायक हैं
मुज़फ्फरनगर लोकसभा का राजनीतिक इतिहास
गंगा-जमुना के दोआब में बसा मुज़फ्फरनगर अपनी साझा विरासत के लिए जाना जाता है। यहां की मिट्टी में सांप्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल मौजूद है। वहलना जैन मंदिर की एक दीवार से मस्जिद सटी है तो दूसरी ओर शिव मंदिर। यह नज़ारा बताता है कि यह शहर गंगा-जमुनी तहज़ीब को अपने में समेटे हुए है। गन्ने और गुड़ की खेती के लिए मशहूर इस जिले की राजनीति भी उतनी ही समृद्ध और पेचीदा रही है। यही वजह है कि हर चुनाव में मुज़फ्फरनगर की सियासत पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश का रुख तय करती है।
कांग्रेस और भाजपा की बराबरी
17 चुनावों में कांग्रेस और भाजपा दोनों को 5-5 बार जीत मिली है। कांग्रेस आखिरी बार 20 साल पहले जीती थी। आजादी के बाद पहले तीन चुनावों में कांग्रेस का दबदबा रहा। 1971 में कांग्रेस ने सीपीआई के विजय पाल सिंह को समर्थन दिया और जनता ने भी उनका साथ दिया।
1977 में “इंदिरा हटाओ” की लहर में जनता पार्टी जीती। इसके बाद 1984 में इंदिरा की हत्या से उपजी सहानुभूति में कांग्रेस फिर जीती। 1989 में वीपी सिंह के उम्मीदवार मुफ्ती मुहम्मद सईद यहां से जीते। 1991 में रामलहर आई और भाजपा काबिज हुई। यह सिलसिला 1998 तक चला।
1999 में फिर कांग्रेस को मौका मिला। इसके बाद सपा और बसपा का भी खाता खुला। 2014 में दंगे और मोदी लहर ने भाजपा को और मजबूत किया। तब से भाजपा यहां काबिज है।
जाट राजनीति और बालियान
किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह 1971 में यहां से हारे थे। यह हार उनके लिए बड़ा झटका था। इससे यह साबित हो गया कि सिर्फ जाट नेता की छवि से यहां जीत नहीं मिलती। जनता ने हमेशा नीति और समीकरण को तरजीह दी है।
इसके बावजूद जाट नेताओं का इस सीट से गहरा नाता रहा है। नरेश कुमार बालियान यहां से संसद पहुंचने वाले पहले जाट थे। 1991 में उन्होंने मुफ्ती मोहम्मद सईद को हराकर इतिहास रचा। इसके बाद 1996 और 1998 में सोहनवीर सिंह ने भाजपा की जीत का सिलसिला जारी रखा। 2014 और 2019 में संजीव बालियान यहां से सांसद बने और जाट राजनीति का चेहरा बन गए।
मुज़फ्फरनगर जातीय समीकरण
इस सीट पर मुस्लिम और जाट मतदाताओं की भूमिका सबसे अहम है। मुस्लिम मतदाता कुल का एक चौथाई से अधिक हैं। जाट जोड़ने पर यह संख्या 40% से अधिक हो जाती है। इन दोनों समुदायों की एकजुटता या बिखराव — दोनों ही चुनाव का रुख तय करते हैं।
इसके अलावा दलितों का समर्थन भी निर्णायक भूमिका निभाता है। पिछड़ी जातियों में कश्यप और सैनी की अच्छी संख्या है। ब्राह्मण, वैश्य और अन्य अगड़ी जातियां भी समीकरण प्रभावित करती हैं। त्यागी ब्राह्मण और पिछड़े वर्गों की भूमिका भी कम नहीं आंकी जा सकती।
90 के दशक से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण एक प्रभावी फैक्टर बन गया। 2013 के दंगे के बाद यह और गहरा हो गया। इसीलिए पिछले तीन दशकों में भाजपा अधिकतर चुनावों में आगे रही है।
अब तक चुने गए सांसद
- 1952 — कांग्रेस: हीरा वल्लभ त्रिपाठी, सुंदर लाल, अजित प्रसाद जैन
- 1957, 1962 — कांग्रेस: सुमत प्रसाद
- 1967 — भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी: लताफ़त अली खान, विजयपाल सिंह
- 1977 — जनता पार्टी: सईद मुर्तजा
- 1980 — जनता पार्टी (सेक्युलर): गयूर अली खान
- 1984 — कांग्रेस: धर्मवीर सिंह त्यागी
- 1989 — जनता दल: मुफ़्ती मोहम्मद सईद
- 1991 — भाजपा: नरेश कुमार बालियान
- 1996, 1998 — भाजपा: सोहनवीर सिंह
- 1999 — कांग्रेस: एस सईदुज्जमां
- 2004 — सपा: मुनव्वर हसन
- 2009 — बसपा: कादिर राणा
- 2014, 2019 — भाजपा: संजीव बालियान



