गाज़ीपुर। उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर जिले की मोहम्मदाबाद तहसील में बसा शेरपुर एक ऐसा गाँव है जिसका नाम भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सोने के अक्षरों में लिखा जाना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्यवश यह गाँव आज भी उस गुमनामी के अंधेरे में है जो बड़े बलिदानों के साथ अक्सर होता है। 435 साल पुरानी इस बस्ती ने हुमायूँ के काल से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक — हर मोड़ पर इतिहास को छुआ। यहाँ के आठ वीर सपूतों ने तिरंगे की शान के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए — लेकिन देश की आजादी की कहानी में उनका नाम अब भी उतना नहीं चमका जितना चमकना चाहिए था।
स्थापना — 1590 में दुल्लह राय ने बसाया शेरपुर
शेरपुर गाँव की नींव 1590 ई. में बाबू दुल्लह राय ने रखी थी। लेकिन शेरपुर की असली जड़ें इससे भी पुरानी हैं। सांकृत्य गोत्र के शंकरवार वंश के वंशज मूलतः फतेहपुर जिले के फतुहाबाद से आए थे।
1528 ई. में मुगल सेनापति मीर बाकी और भूमिहार जमींदारों की संयुक्त सेना के बीच कानपुर के पास मदारपुर का युद्ध हुआ। इस युद्ध में भूमिहार वीरों ने डटकर मुकाबला किया लेकिन मुगल सेना की आधुनिक तकनीक और बारूद के सामने वे टिक नहीं सके। यह पूर्व की ओर बढ़ती मुगल सेना के सामने अंतिम बड़ा प्रतिरोध था — जिसका उल्लेख ‘कान्यकुब्ज प्रबोधिनी’ में मिलता है।
इस युद्ध के बाद कामदेव मिसिर और धामदेव मिसिर के परिवार पूर्व की ओर बढ़े और ज़मानिया तहसील के सकरादीह में आकर बस गए। तीसरे भाई बीरमदेव मिसिर का परिवार उत्तर की ओर किसी अज्ञात स्थान पर चला गया।
यह 1530 ई. की बात है। इसके बाद कामदेव मिसिर के पुत्र अचल मिसिर की पाँचवीं पीढ़ी में बाबू दुल्लह राय हुए। उन्होंने पवित्र गंगा नदी पार की और अपने बड़े परिवार के लिए एक नई बस्ती बसाने का संकल्प लिया। इसी जगह का नाम रखा — शेरपुर। दुल्लह राय के वंशजों ने आगे चलकर शेरपुर कलाँ, शेरपुर खुर्द, सेमरा, फिरोजपुर, पृथ्वीपुर और जमालपुर गाँव बसाए।
गाँव का एक और नाम “दुल्लहपुर” भी था — अपने संस्थापक को श्रद्धांजलि। इस पूरे क्षेत्र को “शेरपुर परगना” कहा जाता था जिसका कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 4,913.64 हेक्टेयर है। यह गाँव मोहम्मदाबाद तहसील मुख्यालय से 10 किलोमीटर और गाज़ीपुर जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
हुमायूँ और शेरपुर — मुगल काल का ऐतिहासिक संबंध
गाज़ीपुर जिले के आधिकारिक इतिहास में स्पष्ट उल्लेख है कि मुगल बादशाह हुमायूँ से जुड़ी एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना शेरपुर गाँव के आसपास के क्षेत्र — मोहम्मदाबाद परहर बड़ी — में घटी थी।
उस दौर में शेख जमाल अहमद मक्की — एक विद्वान और धार्मिक व्यक्तित्व — हुमायूँ की सेना के साथ गाज़ीपुर के नासिर खान लोहानी को अधीन करने के अभियान पर निकले थे। गाज़ीपुर से गुजरते हुए वे मोहम्मदाबाद परहर बड़ी पहुँचे — जो शेरपुर के निकटवर्ती क्षेत्र था। उसे यह स्थान इतना पसंद आया कि उसने हुमायूँ से यहाँ रुकने की अनुमति माँगी।
उस समय यह पूरा इलाका घने जंगलों से घिरा था और यहाँ कई स्थानीय जनजातियाँ निवास करती थीं। क्षेत्र में अव्यवस्था और अशांति का माहौल था। जब शेख जमाल की समझाइश का कोई असर नहीं हुआ तो उसने स्वयं बादशाह हुमायूँ को एक पत्र लिखा — जिसमें इस क्षेत्र की अव्यवस्था का वर्णन किया और एक सक्षम शासक भेजने की माँग की।
इस प्रकार शेरपुर और उसके आसपास का क्षेत्र मुगल काल की उस ऐतिहासिक उथल-पुथल का प्रत्यक्ष गवाह बना — जब बाबर के बाद हुमायूँ पूर्वांचल पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा था। यह वही दौर था जब शेरपुर के संस्थापक परिवार के पूर्वज भी मदारपुर युद्ध के बाद पूर्व की ओर बढ़ रहे थे — और इतिहास के दो अलग-अलग धागे इसी भूमि पर आकर मिल रहे थे।
ब्रिटिश काल — “पचीसो हजार” की पहचान
ब्रिटिश शासन के दौरान शेरपुर और रेवतीपुर को मिलाकर “पचीसो हजार” के नाम से जाना जाता था। यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि ये दोनों गाँव मिलकर ब्रिटिश खजाने में ₹25,000 की नियमित लगान जमा करते थे — जो उस समय एक बड़ी रकम थी। अंग्रेजी हुकूमत के लिए यह क्षेत्र आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण था।
लेकिन शेरपुर और मोहम्मदाबाद के आसपास का यह इलाका केवल लगान देने वाला क्षेत्र नहीं था — यहाँ की मिट्टी में विद्रोह के बीज भी पड़े हुए थे। अंग्रेज किसानों को उनकी उपजाऊ जमीन पर जबरन नील की खेती कराते थे। इससे खाद्यान्न उत्पादन घटता था और किसान कर्ज के बोझ तले दबते जाते थे। गाज़ीपुर क्षेत्र में इसी शोषण के खिलाफ “राजू बक्शी विद्रोह” के नाम से एक बड़ा किसान आंदोलन उठा — जिसमें यहाँ के किसानों ने अंग्रेज बागान मालिकों के नील के गोदामों में आग लगा दी। यह विद्रोह उस धधकते असंतोष की खुली अभिव्यक्ति थी जो दशकों से इस भूमि के भीतर पनप रहा था।
1857 की क्रांति के दौरान भी गाज़ीपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में अंग्रेजों को भारी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। शेरपुर जैसे गाँवों के लोग उस राष्ट्रीय संघर्ष से अलग नहीं थे। असंतोष की यह आग 1857 में भले ही दबा दी गई हो — लेकिन यह बुझी नहीं। वह धीरे-धीरे सुलगती रही — और 1942 में शेरपुर के आठ वीरों के रूप में इतिहास की सबसे गौरवशाली ज्वाला बनकर फूट पड़ी।
स्वतंत्रता संग्राम में शेरपुर की भूमिका
गाज़ीपुर जिले का यह हिस्सा होम रूल आंदोलन के समय से ही राजनीतिक जागरूकता का केंद्र बन चुका था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रभाव यहाँ गहरा था। गाँव के युवा राष्ट्रीय चेतना से भरे हुए थे और अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए तैयार थे। इसी वातावरण में डॉ. शिव पूजन राय का उदय हुआ — जो आगे चलकर शेरपुर के सबसे महान सपूत साबित हुए।
डॉ. शिव पूजन राय — 29 साल में शहादत
डॉ. शिव पूजन राय का जन्म 1 मार्च 1913 को शेरपुर गाँव के एक भूमिहार परिवार में हुआ था। छोटी उम्र से ही उनके मन में देशभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी थी। 1942 में उन्हें जिला कांग्रेस कमेटी का महासचिव चुना गया। केवल 29 वर्ष की आयु में उन्होंने वह कर दिखाया जो इतिहास के पन्नों में सदा के लिए दर्ज हो गया।
18 अगस्त 1942 — वह दिन जो इतिहास बन गया
9 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने “भारत छोड़ो” का आह्वान किया। पूरे देश में विद्रोह की लहर दौड़ गई। 10 अगस्त को अंग्रेजी हुकूमत ने गाज़ीपुर जिले के 129 नेताओं के लिए गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए। लेकिन शेरपुर के वीर डरे नहीं।
18 अगस्त 1942 — यह वह तारीख है जो शेरपुर के हर घर में आज भी जीवित है। डॉ. शिव पूजन राय के नेतृत्व में शेरपुर के स्वतंत्रता सेनानियों का एक जत्था मोहम्मदाबाद तहसील पर तिरंगा फहराने के लिए निकला। उनके साथ थे — ऋषेश्वर राय, वंश नारायण राय, राम बदन उपाध्याय, राज नारायण राय, नारायण राय, वशिष्ठ नारायण राय और बंस नारायण राय। ये सभी जानते थे कि आगे क्या होगा — लेकिन तिरंगे की शान के सामने उन्होंने अपने प्राणों की परवाह नहीं की।
जब यह जत्था तहसील भवन की ओर बढ़ा — तो ब्रिटिश तहसीलदार मुनरो ने उन्हें रुकने की चेतावनी दी। लेकिन डॉ. शिव पूजन राय हाथ में तिरंगा थामे आगे बढ़ते रहे। तहसीलदार मुनरो ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर से गोली चलाई। डॉ. राय की छाती में पाँच गोलियाँ लगीं — और वे वहीं शहीद हो गए। उनके साथ सात और वीर भी उस दिन अमर हो गए। इतिहास इन्हें “अष्ट शहीद” यानी “शेरपुर के आठ शहीद” के नाम से जानता है।
शहादत के बाद — अंग्रेजी आतंक का राज
इन वीरों की शहादत ने पूरे गाज़ीपुर को जगा दिया। 19 अगस्त को नागरिकों ने लगभग पूरे गाज़ीपुर जिले पर नियंत्रण कर लिया और तीन दिनों तक अपनी स्वतंत्र सरकार चलाई — यह अपने आप में एक अभूतपूर्व घटना थी।
लेकिन अंग्रेजी हुकूमत का जवाब बेहद क्रूर था। जिला गजेटियर के अनुसार यह एक “आतंक का राज” था। सेना और घुड़सवार पुलिस ने जिले भर में दमन शुरू किया। अगले कुछ दिनों में 150 से अधिक लोगों को गोलियों से भून दिया गया। 74 गाँव जला दिए गए। सरकारी अधिकारियों और पुलिस ने नागरिकों से ₹35 लाख की लूट की। पूरे गाज़ीपुर जिले पर ₹4.5 लाख का सामूहिक जुर्माना थोपा गया — जो उस जमाने में एक बेहद बड़ी रकम थी।
शेरपुर गाँव को विशेष रूप से सजा दी गई। यहाँ के सबसे बुजुर्ग दलित निवासी हरि शरण राम ने उन दिनों को याद करते हुए कहा था — “गाँव में न चिड़िया बची, न इंसान। जो बच सके वो भागे। लूटपाट होती रही।”
लेकिन इस सब के बावजूद शेरपुर के लोगों का हौसला नहीं टूटा।
अष्ट शहीद — आज भी जीवित हैं स्मृतियों में
18 अगस्त 1942 को शेरपुर के जिन आठ वीरों ने तिरंगे के लिए प्राण दिए — उनकी स्मृति आज भी मोहम्मदाबाद तहसील की दीवारों में जीवित है। यहाँ तहसील कार्यालय में “शहीद स्मारक समिति” द्वारा एक स्मारक बनाया गया है।
इस ऐतिहासिक घटना के बाद स्वयं पंडित जवाहरलाल नेहरू गाज़ीपुर आए थे और अष्ट शहीदों के बलिदान को नमन किया था। उन्होंने कहा था — “अगर डॉ. शिव पूजन राय नहीं होते तो महात्मा गांधी की अहिंसा विधवा हो गई होती।” इसके बाद लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी भी इस पावन स्थल पर आकर शहीदों को श्रद्धांजलि दे चुके हैं। राजीव गांधी 1980 में कांग्रेस महासचिव के रूप में यहाँ आए थे — और उन्हीं के निर्देश पर इस पुराने तहसील भवन को “शहीद स्मृति भवन” घोषित किया गया। इस प्रकार यह तहसील कार्यालय देश के चार प्रधानमंत्रियों की उपस्थिति से सम्मानित हो चुका है। उत्तर प्रदेश के लगभग सभी मुख्यमंत्री भी किसी न किसी समय यहाँ आकर इन वीरों को नमन कर चुके हैं।
यहाँ एक ऐसी परंपरा है जो पूरे देश में शायद और कहीं नहीं मिलती — मोहम्मदाबाद तहसील पर 15 अगस्त की जगह 18 अगस्त को तिरंगा फहराया जाता है। यह तारीख वही है जब इन आठ वीरों ने शहादत पाई थी। यह परंपरा इस बात का प्रमाण है कि यहाँ के लोगों के लिए 18 अगस्त ही असली स्वतंत्रता दिवस है।
इन आठों वीरों में से प्रत्येक का नाम आज भी शेरपुर के हर घर में सम्मान से लिया जाता है। ये वे लोग थे जिन्होंने पारिवारिक जिम्मेदारियाँ छोड़कर जान की परवाह किए बिना तिरंगे को थामे आगे बढ़े — और इतिहास बन गए।
आज का शेरपुर — जनसंख्या, प्रशासन और शहीद स्थल
2011 की जनगणना के अनुसार शेरपुर की जनसंख्या 25,795 है — जिसमें 13,491 पुरुष और 12,304 महिलाएं हैं। गाँव में 4,053 परिवार रहते हैं। गाँव का पिन कोड 233227 है। ग्राम पंचायत के माध्यम से स्थानीय प्रशासन चलाया जाता है जिसमें ग्राम प्रधान सर्वोच्च निर्वाचित प्रतिनिधि होते हैं। जनगणना के एक अन्य आँकड़े के अनुसार पूरे शेरपुर परगने की कुल आबादी 31,322 है और घनत्व 640 प्रति वर्ग किलोमीटर है।
शेरपुर गाँव और मोहम्मदाबाद तहसील — दोनों जगह इन वीरों की स्मृति को सहेजा गया है। मोहम्मदाबाद तहसील परिसर में अष्ट शहीद पार्क बनाया गया है जहाँ लाल पत्थरों से निर्मित एक भव्य विजय स्तंभ स्थापित किया गया है। इस स्तंभ पर आठों शहीदों के नाम अंकित हैं — डॉ. शिव पूजन राय, ऋषेश्वर राय, वंश नारायण राय, राम बदन उपाध्याय, राज नारायण राय, नारायण राय, वशिष्ठ नारायण राय और बंस नारायण राय।
यह स्तंभ न केवल उन आठ वीरों के शौर्य का प्रतीक है — बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा का स्रोत भी है। शहीद स्मृति भवन के नाम से यह पुराना तहसील भवन आज एक ऐतिहासिक धरोहर बन चुका है। हर वर्ष 18 अगस्त को यहाँ विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता, स्कूली बच्चे और स्थानीय नागरिक एकत्रित होकर इन शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। देर शाम तक सांस्कृतिक कार्यक्रम चलते हैं — और वह तिरंगा जो महात्मा गांधी के चरखे का चिह्न लिए हुए था — आज भी शहीद भवन में सुरक्षित रखा गया है।
वह गाँव जो भूला दिया गया — लेकिन भुलाया नहीं जा सकता
शेरपुर की कहानी एक ऐसे गाँव की कहानी है जिसने देश के लिए सब कुछ दिया — लेकिन बदले में मिला कम। देश की मुख्यधारा के इतिहास में उन आठ शहीदों का नाम उतनी प्रमुखता से नहीं आता जितनी बड़ी उनकी कुर्बानी थी। डॉ. शिव पूजन राय की उम्र मात्र 29 साल थी जब उन्होंने पाँच गोलियाँ खाकर तिरंगे की शान बचाई। उनके सात साथियों ने भी उसी दिन अपने परिवारों को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।
लेकिन शेरपुर का यह दर्द इतिहास की किताबों में कैद नहीं — यह हर साल 18 अगस्त को मोहम्मदाबाद तहसील पर फहराते तिरंगे में जीवित होता है। वह तिरंगा जिसके लिए कभी डॉ. शिव पूजन राय सहित अष्ट शहीद अपनी आखिरी साँस तक लड़े।
आज जरूरत है कि इस गाँव के बलिदान की गाथा को देश के कोने-कोने तक पहुँचाया जाए। शेरपुर के अष्ट शहीद किसी एक जिले या एक प्रदेश की विरासत नहीं हैं — वे पूरे भारत के गौरव हैं। उनका नाम इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में, युवाओं की जुबान पर और देश की सामूहिक स्मृति में उतनी ही प्रमुखता से होना चाहिए जितना किसी भी महान स्वतंत्रता सेनानी का होता है।
