सासाराम/नई दिल्ली। भारतीय रेलवे के लिए यह सप्ताह शर्मनाक साबित हो रहा है। कल यानी रविवार 17 मई को मध्य प्रदेश के रतलाम के पास राजधानी एक्सप्रेस के AC कोच में भीषण आग लगी — और आज सोमवार 18 मई की सुबह बिहार के सासाराम रेलवे स्टेशन पर खड़ी सासाराम-आरा-पटना पैसेंजर ट्रेन के जनरल कोच में आग भड़क उठी। लगातार दो दिन अलग-अलग ट्रेनों में आग — यह महज संयोग नहीं बल्कि रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाता है।
क्या हुआ सासाराम में
सोमवार सुबह करीब छह बजे सासाराम रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 6 पर खड़ी ट्रेन नंबर 53212 के जनरल कोच D3 में अचानक आग लग गई। देखते ही देखते कोच से धुआं और लपटें उठने लगीं। यात्री जान बचाने के लिए सामान छोड़कर भागने लगे — प्लेटफॉर्म पर अफरा-तफरी मच गई। RPF और अग्निशमन दल के पहुंचने में देर हुई — प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार स्टेशन पर लगी पाइपलाइन में पानी नहीं था और अग्निशमन सिलेंडर भी खाली थे। इस लापरवाही की वजह से आग पर काबू पाने में पूरा एक घंटा लग गया — और तब तक एक पूरी बोगी जलकर खाक हो गई। RPF इंस्पेक्टर संजीव कुमार ने बताया कि आग पर काबू पा लिया गया है और कोई जनहानि नहीं हुई। जलती हुई बोगी को ट्रेन से अलग कर दिया गया और ट्रेन को रद्द कर दिया गया। शॉर्ट सर्किट की आशंका जताई जा रही है।
रेलवे की लापरवाही — सवाल जो उठने चाहिए
सासाराम की यह घटना केवल आग की खबर नहीं — यह रेलवे की चरमराती सुरक्षा व्यवस्था का आईना है। स्टेशन पर लगी पाइपलाइन में पानी नहीं था। अग्निशमन सिलेंडर खाली थे। इसका मतलब साफ है — नियमित रखरखाव और जांच नहीं हो रही। अगर आग तेज होती या भीड़ ज्यादा होती तो बड़ा हादसा हो सकता था।
कल राजधानी एक्सप्रेस में भी शॉर्ट सर्किट की आशंका थी। आज सासाराम में भी वही कारण। क्या रेलवे अपने कोचों का नियमित विद्युत निरीक्षण कर रही है? क्या अग्निशमन उपकरणों की नियमित जांच हो रही है? इन सवालों के जवाब रेलवे को देने होंगे।
पिछले कुछ वर्षों के बड़े रेल हादसे
भारतीय रेलवे के इतिहास में दुर्घटनाओं की लंबी फेहरिस्त है। 2023 में ओडिशा के बालासोर में हुई तीन ट्रेनों की टक्कर में 293 लोग मारे गए — यह हाल के दशकों का सबसे भीषण रेल हादसा था। 2025 में जलगांव में पुष्पक एक्सप्रेस में झूठी आग की अफवाह के कारण यात्री पटरी पर उतर गए और कर्नाटक एक्सप्रेस की चपेट में आने से 12 लोगों की जान गई। 2025 में ही बेंगलुरु-कामाख्या एक्सप्रेस के 11 कोच पटरी से उतर गए जिसमें 1 की मौत और 8 लोग घायल हुए थे। 2024 में कंचनजंगा एक्सप्रेस दुर्घटना में 9 लोग मारे गए। 2023-24 में कुल 313 लोग 40 ट्रेन दुर्घटनाओं में जान गंवा चुके हैं।
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने दिसंबर 2025 में संसद को बताया था कि 2025-26 में नवंबर तक केवल 11 बड़ी दुर्घटनाएं हुईं — जो एक रिकॉर्ड कम आंकड़ा है। लेकिन यह दावा तब कितना खोखला लगता है जब लगातार दो दिन अलग-अलग ट्रेनों में आग लगती है। सवाल यह है कि अगर दुर्घटनाएं वाकई कम हो रही हैं तो कोचों में शॉर्ट सर्किट क्यों हो रहा है? अग्निशमन उपकरण खाली क्यों मिलते हैं? नियमित तकनीकी निरीक्षण कागजों पर होता है या जमीन पर भी?
KAVACH — अभी भी अधूरी है यात्रा
रेलवे का टक्कर रोधी सिस्टम KAVACH टक्कर रोकने में कारगर है — लेकिन आग जैसी घटनाओं में इसकी कोई भूमिका नहीं है। फिर भी KAVACH की प्रगति की बात करें तो मार्च 2026 तक KAVACH 4.0 को सिर्फ 1,452 किलोमीटर पर ही चालू किया जा सका है — जबकि लक्ष्य 6,000 किलोमीटर का था। कुल 24,427 किलोमीटर पर काम शुरू हुआ है लेकिन कमीशनिंग अभी बहुत पीछे है।
दिल्ली-मुंबई मार्ग पर विरार-मुंबई सेंट्रल सेक्शन का काम सितंबर 2026 तक पूरा होने का लक्ष्य है। यानी सबसे व्यस्त मार्गों पर भी KAVACH अभी पूरी तरह लागू नहीं हुआ। आग से बचाव के लिए fire detection और suppression systems की जरूरत अलग है — जो देश के अधिकांश कोचों में अभी तक नहीं लगाए गए हैं। KAVACH टक्कर रोक सकता है — लेकिन शॉर्ट सर्किट से लगने वाली आग नहीं।
यात्रियों की सुरक्षा — किसकी जिम्मेदारी
भारतीय रेलवे रोज 1.3 करोड़ से ज्यादा यात्रियों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाती है। इतने बड़े नेटवर्क में कुछ न कुछ गड़बड़ी होना स्वाभाविक है — लेकिन बुनियादी सुरक्षा उपायों की अनदेखी स्वीकार्य नहीं है। लगातार दो दिन ट्रेनों में आग — और दोनों बार शॉर्ट सर्किट की आशंका — यह रेलवे को आत्मचिंतन का संकेत है। यात्रियों की जान की सुरक्षा सबसे पहले है — और इसके लिए कोच की नियमित जांच, अग्निशमन उपकरणों का रखरखाव और स्टाफ की उचित ट्रेनिंग अनिवार्य है।
