नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को एक बड़ा फैसला सुनाते हुए आम आदमी पार्टी को डी-रजिस्टर करने और अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया तथा दुर्गेश पाठक को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने इस याचिका को “पूरी तरह गलतफहमी पर आधारित” करार देते हुए स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता का तर्क “पूरी तरह निराधार और बिना किसी विचार के” है।
याचिका में क्या मांग थी
यह PIL सतीश कुमार अग्रवाल ने दायर की थी। उन्होंने चुनाव आयोग को निर्देश देने की मांग की थी कि AAP का पंजीकरण रद्द किया जाए और केजरीवाल, सिसोदिया तथा दुर्गेश पाठक को संसद और विधानसभा चुनाव लड़ने से हमेशा के लिए वंचित किया जाए। याचिकाकर्ता का तर्क था कि दिल्ली आबकारी नीति मामले में न्यायमूर्ति स्वर्णा कांता शर्मा के सामने पेश होने से इनकार करके AAP नेताओं ने संविधान के प्रति अपनी निष्ठा का उल्लंघन किया — जो जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 29A(5) के तहत दलों के पंजीकरण के लिए जरूरी है।
कहां से शुरू हुआ विवाद
इस मामले की जड़ें फरवरी 2026 में हैं जब एक ट्रायल कोर्ट ने केजरीवाल, सिसोदिया और 21 अन्य आरोपियों को दिल्ली आबकारी नीति मामले में बरी कर दिया था। CBI ने इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी — और यह मामला न्यायमूर्ति स्वर्णा कांता शर्मा की पीठ के सामने आया। अप्रैल 2026 में केजरीवाल और अन्य AAP नेताओं ने न्यायमूर्ति शर्मा पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए उनके सामने पेश होने से इनकार करने की घोषणा की और इसे “सत्याग्रह” का नाम दिया। इसके बाद न्यायमूर्ति शर्मा ने 14 मई को केजरीवाल, सिसोदिया, संजय सिंह, सौरभ भारद्वाज और विनय मिश्रा के खिलाफ आपराधिक अवमानना कार्यवाही शुरू की। उसी दिन न्यायमूर्ति शर्मा ने खुद भी इस मामले से हाथ खींच लिया — न्यायिक अनुशासन के तहत।
4 अगस्त को अगली सुनवाई
19 मई को दिल्ली हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने केजरीवाल, सिसोदिया, संजय सिंह और अन्य AAP नेताओं को आपराधिक अवमानना नोटिस जारी किया। उन्हें चार हफ्ते के भीतर अपना जवाब दाखिल करना होगा। इस मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त 2026 को होगी।
हाईकोर्ट का फैसला
आज की PIL पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने साफ किया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो चुनाव आयोग को याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए आधारों पर किसी राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द करने का अधिकार देता हो। सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि किसी दल का पंजीकरण रद्द करना एक बेहद गंभीर कदम है — और एक बार पंजीकरण मिल जाने के बाद चुनाव आयोग के पास उसे वापस लेने की सामान्य शक्ति नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ अवमानना कार्यवाही से उसकी पार्टी के पंजीकरण पर कोई असर नहीं पड़ता।
AAP के लिए राहत
हाईकोर्ट का यह फैसला AAP के लिए बड़ी राहत जरूर है — लेकिन असली लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई। केजरीवाल और अन्य AAP नेताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना का मामला अभी भी चल रहा है — जिसकी अगली सुनवाई 4 अगस्त को होगी। आबकारी नीति मामले में CBI की याचिका भी न्यायमूर्ति मनोज जैन की पीठ के सामने सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।
