लखनऊ/नोएडा। उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर से निकला एक शख्स, जो खुद को बड़ा निवेशक और कारोबारी बताता था — आज देश के सबसे बड़े निवेश घोटालों में से एक का मुख्य आरोपी है। नवाब अली उर्फ लविश चौधरी ने बॉटब्रो, बॉटअल्फा, क्यूएफएक्स, वाईएफएक्स, माइन क्रिप्टोज़, क्रॉसमार्केट, क्रेसेट कैपिटल जैसी फ़र्ज़ी कंपनियों के ज़रिए देशभर के हज़ारों मध्यमवर्गीय परिवारों की जमा पूँजी लूट ली। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जाँच में यह रकम ₹3200 करोड़ से और उससे ऊपर तक के होने का अनुमान है। आज वह दुबई में आराम से बैठा है, जबकि उसके हज़ारों पीड़ित भारत में कर्ज़ के बोझ तले दबे हैं, रोज़ कर्ज़ वसूली एजेंटों के फोन झेल रहे हैं और अपनी ज़मीन-जायदाद बेचने पर मजबूर हैं।
कौन है नवाब अली उर्फ लविश चौधरी
लविश चौधरी मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर का रहने वाला है। शुरुआती दिनों में उसने खुद को शिक्षक और छोटे कारोबारी के रूप में पेश किया। इसके बाद एमएलएम (मल्टी-लेवल मार्केटिंग) की दुनिया में कदम रखकर वह दुबई जाकर बस गया। वहाँ से उसने एक चमकदार “सफलता की कहानी” गढ़ी — महँगी गाड़ियाँ, आलीशान होटल और विदेश यात्राओं की तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालीं और खुद को बड़े निवेशक (वेंचर कैपिटलिस्ट) के रूप में स्थापित किया। इसी दिखावे को पुख़्ता करने के लिए उसने अबू धाबी टी10 क्रिकेट लीग में “यूपी नवाब” नाम की टीम भी खरीदी। लोगों को लगा — जो इतने बड़े स्तर पर निवेश करता है, उसकी योजना में पैसा लगाना तो बेहद सुरक्षित होगा। और यही उसकी सबसे बड़ी चाल थी।
एजेंटों के सिंडिकेट का जाल
लविश का पूरा धंधा दो चीज़ों पर टिका था — झूठा भरोसा और एमएलएम नेटवर्क। उसने बॉटब्रो, क्यूएफएक्स, वाईएफएक्स, क्रॉसमार्केट की वेबसाइटें बनाईं जो दिखने में बिल्कुल असली ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म जैसी लगती थीं। निवेशकों से वादा किया जाता था कि उनका पैसा एआई आधारित फॉरेक्स ट्रेडिंग रोबोट के ज़रिए काम करेगा और हर महीने 5-6% रिटर्न मिलेगा। सच्चाई यह थी कि कोई असली ट्रेड नहीं होता था। डैशबोर्ड पर दिखने वाला सारा मुनाफ़ा पूरी तरह फ़र्ज़ी था — सिर्फ स्क्रीन पर नंबर बदलते थे। शुरुआत में छोटी-छोटी निकासी मिलती थी ताकि लोगों का भरोसा बना रहे। जब बड़ा पैसा निकालने की बारी आती, तो “तकनीकी दिक्कत”, “दुबई से मंज़ूरी”, “नया प्लेटफॉर्म लॉन्च” जैसे बहाने बनते और अंत में वेबसाइट ही बंद हो जाती।
नेटवर्क फैलाने के लिए दलालों (एजेंटों) की पूरी फौज तैयार की गई थी। इन एजेंटों को मोटा कमीशन, महँगे तोहफ़े और विदेश यात्राएँ दी जाती थीं। ये एजेंट अपने करीबी लोगों को — दोस्त, रिश्तेदार, पड़ोसी — योजना में जोड़ते थे। सबसे खतरनाक बात यह थी कि एक भरोसेमंद इंसान के कहने पर लोग लाखों रुपए लगा देते थे — और ऐसे भरोसेमंद लोग खुद भी इस ठगी के जाल का हिस्सा होते थे। कमीशन, एजेंट और दुबई में बैठा संचालक — यह पूरा एक सुनियोजित गिरोह है, जिसकी जड़ें देशभर में फैली हैं।
यूपी से देशभर तक फैली तबाही
यह घोटाला सिर्फ किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश में इसकी जड़ें सबसे गहरी हैं। अकेले मेरठ के सरधना और सरूरपुर इलाके में 500 से अधिक निवेशकों से ₹20 करोड़ की ठगी सामने आई। मुज़फ्फरनगर, शामली, नोएडा, गाज़ियाबाद, लखनऊ — हर ज़िले से पीड़ितों की संख्या बढ़ती रही। हज़ारों परिवार ऐसे हैं जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी की बचत इस योजना में लगा दी। किसी ने बेटी की शादी के लिए जोड़े पैसे डाले, किसी ने ज़मीन बेचकर निवेश किया, तो किसी ने बैंक से कर्ज़ लेकर पैसे लगाए। आज इनमें से कई परिवार अपनी संपत्ति गिरवी रखने या बेचने की कगार पर पहुँच गए हैं, और उनकी पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं है।
जाँच एजेंसियाँ और अधूरी कार्रवाई
ईडी ने पीएमएलए के तहत जाँच तेज़ की है। 11 फरवरी 2025 को दिल्ली, नोएडा, रोहतक और शामली में एक साथ छापे पड़े — 30 बैंक खाते फ्रीज़ हुए और ₹170 करोड़ जब्त किए गए। इसके बाद 4 जुलाई 2025 को फिर छापे पड़े। 17 सितंबर 2025 को मुख्य एजेंट हरिंदर पाल सिंह को गिरफ्तार किया गया। 26 सितंबर 2025 को यूपी के एजेंट नवाब हसन को गिरफ्तार किया गया — जिसके अंडर 10,000 से अधिक निवेशकों का नेटवर्क था। मध्य प्रदेश एसटीएफ ने भी 11 से अधिक सहयोगियों को गिरफ्तार किया है और लविश के खिलाफ लुकआउट सर्कुलर जारी किया है। कुल मिलाकर ईडी ने ₹400 करोड़+ की संपत्ति जब्त की है।
आरबीआई ने क्यूएफएक्स समेत 13 प्लेटफॉर्म को ब्लैकलिस्ट कर दिया है। भारत-यूएई के बीच 1999 की प्रत्यर्पण संधि के तहत उसे वापस लाने की कोशिश जारी है, पर अभी तक वह दुबई में आज़ाद है।
इसके अलावा लविश चौधरी के बड़े एजेंटों के माध्यम से अभी भी बिटकैपिटल एक्स और मैंगो वेल्थ प्लानर जैसे नए नामों से अनियमित जमा योजनाएँ चलाई जा रही हैं। उन्हीं एजेंटों द्वारा लोगों से दोबारा निवेश करवाया जा रहा है। नाम बदल गए — चेहरा वही रहा।
एमपी एसटीएफ और इंदौर कोर्ट
लविश चौधरी घोटाले की जाँच अब सिर्फ़ ईडी तक सीमित नहीं रही। मध्य प्रदेश एसटीएफ ने भी इसी नेटवर्क पर अलग से केस दर्ज किया है। थाना एसटीएफ भोपाल में 8 नवंबर 2024 को अपराध क्रमांक 39/2024 दर्ज हुआ, जिसमें लविश चौधरी, दीपक शर्मा, मदन मोहन समेत अन्य को आरोपी बनाया गया। आरोप है कि यॉर्कर कैपिटल, वाईएफएक्स और बॉटब्रो जैसे अपंजीकृत प्लेटफॉर्म में निवेश पर 6 से 8 प्रतिशत मासिक रिटर्न का झूठा प्रलोभन देकर निवेशकों से करोड़ों की ठगी की गई।
इस मामले में इंदौर की सत्र अदालत ने हाल ही में एक अहम फैसला सुनाया। सह-आरोपी चिराग किनरा — जो मेसर्स टाइगर डिजिटल सर्विसेज़ प्रा. लि. का निदेशक है — की जमानत याचिका खारिज कर दी गई। कोर्ट के समक्ष रखे गए तथ्यों के मुताबिक, ठगी की रकम सीधे आरोपी कंपनी के खातों में पहुँची — एक मामले में 5 लाख रुपये और दूसरे में अलग से रकम जमा कराई गई बताई गई। इसी आधार पर अदालत ने माना कि प्रथम दृष्टया कंपनी के खातों का इस्तेमाल ठगी में हुआ। चिराग किनरा 27 जनवरी 2026 से जेल में बंद है, और फ़िलहाल पूरा मामला अदालत में विचाराधीन है।
एनजीओ और अधूरे वादे
लविश चौधरी घोटाले की लड़ाई में एक और किरदार सामने आया है — सम्पूर्ण जन शक्ति वेलफेयर ट्रस्ट नाम की एनजीओ, जिसके अध्यक्ष मोहम्मद आसिफ चौधरी हैं। दस्तावेज़ों के अनुसार इस एनजीओ ने 13 जनवरी 2025 को दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) को पत्र भेजकर बॉटब्रो / यॉर्कर एफएक्स / टीएलसी कॉइन घोटाले में एफआईआर दर्ज करने और जाँच की माँग की, जिसमें नवाब अली उर्फ लविश चौधरी को मुख्य साज़िशकर्ता बताया गया। इसके बाद एनजीओ ने अलग-अलग राज्यों के प्रतिनिधियों के ज़रिए हज़ारों पीड़ितों के नोटरीकृत शपथपत्र और पावर ऑफ अटॉर्नी इकट्ठा किए।
यहीं से पीड़ितों की शिकायतें भी शुरू होती हैं। 3 फरवरी 2026 को पहला बड़ा व्हाट्सएप ग्रुप बना। पीड़ितों के अनुसार आसिफ की ओर से एफआईआर की पहली तारीख 5 फरवरी बताई गई — फिर 23 फरवरी — फिर मार्च — फिर अप्रैल — और 2 अप्रैल 2026 को नया ग्रुप “जन शक्ति न्याय सेना बनाम लविश चौधरी” बनाया गया।
हालाँकि लविश चौधरी के खिलाफ मध्य प्रदेश, चंडीगढ़, गोवा और देहरादून में पहले से एफआईआर दर्ज हैं, पर पीड़ितों का कहना है कि जिन्होंने आसिफ पर भरोसा कर अपने पावर ऑफ अटॉर्नी और शपथपत्र सौंपे, उनके मामले में 31 मई 2026 तक — यानी लगभग चार महीने बाद भी — कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई। पीड़ितों का आरोप है कि हर बार नई तारीख का वादा किया गया, पर वो पूरे नहीं हुए। निराश पीड़ित अब खुद 3 जून या 7 जून की तारीख तय करने की कोशिश कर रहे हैं।
पीड़ितों की निराशा
पीड़ितों में गहरी निराशा और आपसी अविश्वास साफ़ झलकता है। महीनों इंतज़ार के बाद कई पीड़ितों का भरोसा अब टूटने लगा है। ग्रुप में एक सदस्य ने लिखा — “मुझे इस ग्रुप से भी remove कर दिया जाएगा — जैसे पहले वाले ग्रुप से किया।” दूसरे ने लिखा — “किसी के भरोसे मत बैठो, अपनी लड़ाई खुद लड़ो।” कई पीड़ित अब इस उलझन में हैं कि जिस एनजीओ और जिन प्रतिनिधियों पर उन्होंने भरोसा किया, उनसे आगे क्या उम्मीद रखें।
कुछ पीड़ितों ने ग्रुप में यह आरोप भी लगाया कि शिकायती शपथपत्र में जिन एजेंटों के नाम और नंबर दर्ज किए गए, बाद में उन्हीं एजेंटों से पैसे की माँग की गई। हालाँकि ये आरोप पूरी तरह पीड़ितों के अपने बयानों और ग्रुप में हुई बातचीत पर आधारित हैं, और इनकी स्वतंत्र रूप से कोई पुष्टि नहीं हुई है।
आसिफ की शिकायतें
इस पूरे मामले का एक और पक्ष भी है, जो दस्तावेज़ों से सामने आता है। आसिफ ने लविश चौधरी के खिलाफ सिर्फ़ व्हाट्सएप ग्रुप में नहीं, बल्कि आधिकारिक स्तर पर भी शिकायतें दर्ज कराईं। दिल्ली ईओडब्ल्यू ने उसकी शिकायत (PC-1418/24) पर 24 फरवरी 2025 को उसे जाँच में शामिल होने का नोटिस भेजा और 28 फरवरी 2025 को उसका बयान दर्ज किया।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की चंडीगढ़ इकाई ने भी क्यूएफएक्स/यॉर्कर एफएक्स घोटाले के सिलसिले में आसिफ को पीएमएलए के तहत समन कर साक्ष्य और दस्तावेज़ माँगे। दस्तावेज़ों में यह भी दर्ज है कि लविश चौधरी को इससे पहले हिमाचल प्रदेश के ₹210 करोड़ घोटाले में उद्घोषित अपराधी (Proclaimed Offender) घोषित किया जा चुका है।
आसिफ पर एनडीपीएस केस
दूसरी ओर, आसिफ खुद भी एक आपराधिक मामले में आरोपी रहा है। दिल्ली के आनंद विहार थाने में उसके खिलाफ एफआईआर नंबर 100/2025 दर्ज हुई — धाराएँ एनडीपीएस एक्ट की धारा 21 और आर्म्स एक्ट की धारा 25। कोर्ट दस्तावेज़ों (SC No. 305/2025) के अनुसार आसिफ को गिरफ्तार किया गया और 20 दिसंबर 2025 को तीसरी जमानत याचिका पर उसे ज़मानत मिली।
सुनवाई के दौरान आसिफ के वकील ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को लविश चौधरी उर्फ नवाब अली और अलीमुद्दीन अंसारी ने झूठे मामले में फँसाया, क्योंकि आसिफ ने इन्हीं के खिलाफ ईडी में शिकायतें दर्ज कराई थीं। कोर्ट ने अपने आदेश में नोट किया कि घटना की सीसीटीवी फुटेज ने पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े किए, आसिफ का कोई पूर्व एनडीपीएस मामला नहीं था, और प्रथम दृष्टया यह आशंका बनती है कि उसे फँसाया गया हो सकता है। यह मामला अभी विचाराधीन है।
इन्हीं हालात के बीच 27 मई 2026 को आसिफ ने ग्रुप में लिखा — “Eid ke Just Baad FIR Hone Jaa Rahi Hai. 3 States Main — Delhi, UP, Uttarakhand।” उसी शाम पीड़ितों के एक अन्य व्हाट्सएप ग्रुप में एक सदस्य ने तस्वीर भेजकर लिखा — “Congratulations Asif ji buying Volvo XC90 after Fortuner।” इस पर आसिफ ने स्वयं पुष्टि की — “Bhai. Exchange Ki Hai Car. Fortuner Ko Badal Kar Ye Volvo XC90।” यह बातचीत उसी व्हाट्सएप ग्रुप की है जिसमें आसिफ ने खुद यह बात स्वीकार की। पीड़ितों का कहना है कि एक तरफ़ एफआईआर के नाम पर “तारीख पर तारीख” मिलती रही — और दूसरी तरफ़ गाड़ी पर गाड़ी बदली जाती रही।
सरकार से सवाल और आगे का रास्ता
यह घोटाला अगर सालों तक चलता रहा, तो जनहित में कुछ सवालों के जवाब मिलने ज़रूरी हैं। ये सवाल किसी एजेंसी या सरकार पर आरोप नहीं, बल्कि पीड़ितों की ओर से एक जायज़ माँग हैं:
- ब्लैकलिस्ट और लुकआउट सर्कुलर के बावजूद लविश चौधरी का नेटवर्क अब तक सक्रिय कैसे बना हुआ है, और वह लोगों को कैसे गुमराह करता रहा?
- आज भी लविश के एजेंट बिटकैपिटल एक्स और मैंगो वेल्थ प्लानर जैसे नए नामों से लोगों को नई योजनाओं में कैसे जोड़ पा रहे हैं — इन पर रोक कब लगेगी?
- इतने बड़े घोटाले के बाद भी ज़्यादातर पीड़ित खुलकर शिकायत दर्ज कराने सामने क्यों नहीं आ रहे, और उन्हें यह भरोसा कैसे दिलाया जाए कि शिकायत करने पर उनकी पहचान और पैसा दोनों सुरक्षित रहेंगे?
- ईडी ने जो ₹400 करोड़+ की संपत्ति जब्त की है, उससे पीड़ितों को उनका मूलधन लौटाने की कोई कानूनी प्रक्रिया है, या यह रकम सिर्फ़ सरकारी खाते में जमा रहेगी?
- भारत-यूएई प्रत्यर्पण संधि 1999 से लागू है — दुबई में बैठे लविश चौधरी की वापसी और उसकी विदेशी संपत्ति-खातों को फ़्रीज़ कराने की प्रक्रिया को और तेज़ कैसे किया जा सकता है?
- क्या स्कूल-कॉलेज और ग्रामीण स्तर पर वित्तीय साक्षरता को बढ़ावा देने की कोई योजना है, ताकि आम लोग “गारंटीड मासिक रिटर्न” जैसे झाँसे में दोबारा न फँसें?
हर निवेशक के लिए ज़रूरी बात
कोई भी वैध निवेश योजना हर महीने तयशुदा 5-6% रिटर्न का वादा नहीं करती। याद रखें — जितना ऊँचा और “गारंटीड” रिटर्न, उतना बड़ा ख़तरा। किसी भी प्लेटफॉर्म में पैसा लगाने से पहले सेबी या आरबीआई की वेबसाइट पर उसकी रजिस्ट्रेशन ज़रूर जाँचें और परिवार में किसी जानकार से सलाह लें। अगर आप पहले से इस तरह की किसी योजना में फँस चुके हैं तो शर्मिंदगी छोड़कर तुरंत cybercrime.gov.in या नज़दीकी साइबर थाने में शिकायत दर्ज करें — जितनी जल्दी शिकायत, रिकवरी की उम्मीद उतनी ज़्यादा।
लविश चौधरी का मामला सिर्फ एक घोटाले की कहानी नहीं — यह व्यवस्था की उन दरारों की कहानी है जिनसे होकर एक आदमी हज़ारों परिवारों की ज़िंदगी भर की कमाई लेकर निकल गया। यूपी सरकार, केंद्र सरकार और ईडी से माँग है कि लविश चौधरी के प्रत्यर्पण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए, पीड़ितों के लिए राहत व्यवस्था बनाई जाए और इस नेटवर्क से जुड़े बाकी एजेंटों के खिलाफ भी सख़्त कार्रवाई की जाए। क्योंकि ₹3200 करोड़ का यह घोटाला कोई आँकड़ा नहीं — यह हज़ारों परिवारों के टूटे सपनों का हिसाब है।
