नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत में न्याय की प्रतीक्षा कर रहे लाखों लोगों के लिए एक बड़ी खबर आई है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शनिवार को सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन अध्यादेश 2026 जारी किया — जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर जजों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 कर दी गई है। मुख्य न्यायाधीश को मिलाकर अब सुप्रीम कोर्ट में कुल 38 जज होंगे। यह अध्यादेश 16 मई को भारत के राजपत्र में अधिसूचित किया गया। शनिवार देर रात केंद्रीय कानून एवं न्याय राज्यमंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करके इसकी जानकारी दी।
93 हजार से अधिक लंबित मामले — इसलिए लेना पड़ा यह फैसला
यह फैसला क्यों जरूरी था — इसका जवाब एक आंकड़े में छिपा है। 31 मार्च 2026 तक सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या रिकॉर्ड 93,143 तक पहुंच गई थी। यानी नब्बे हजार से अधिक मामले ऐसे हैं जिनके फैसले का इंतजार है। न्याय में देरी को न्याय से वंचित करना माना जाता है — और जब देश की सर्वोच्च अदालत में इतने मामले लंबित हों तो यह पूरी न्यायिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। इसीलिए सरकार ने जजों की संख्या बढ़ाने का फैसला किया।
अध्यादेश क्यों — संसद सत्र क्यों नहीं चुना
5 मई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई Union Cabinet की बैठक में यह प्रस्ताव मंजूर किया गया था। मूल योजना यह थी कि संसद में सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन विधेयक 2026 लाया जाए। चूंकि अभी संसद का सत्र नहीं चल रहा — इसलिए संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने का अधिकार है। इस अधिकार का उपयोग करते हुए फैसले को तत्काल प्रभाव से लागू किया गया। जब भी संसद का सत्र आएगा — इस अध्यादेश को विधेयक के रूप में संसद में पारित करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या का इतिहास
1956 में जब सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) अधिनियम बना — तब से लेकर अब तक जजों की संख्या में कई बार बदलाव हुए। हर बार जब अदालत पर काम का बोझ बढ़ा — संख्या बढ़ाई गई। सबसे हालिया बदलाव 2019 में हुआ था — जब संसद ने कानून में संशोधन करके जजों की संख्या 30 से बढ़ाकर 33 की थी। उसके 7 साल बाद अब 2026 में यह संख्या 33 से 37 की गई है।
वर्तमान स्थिति — 32 जज काम कर रहे हैं
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में CJI सहित कुल 32 जज कार्यरत हैं — जो अब स्वीकृत क्षमता 38 से काफी कम है। इस साल कई जज सेवानिवृत्त भी होने वाले हैं — जिससे संख्या और कम हो सकती थी। इसीलिए CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम से उम्मीद है कि वे जल्द ही नई नियुक्तियों के लिए नाम सुझाएंगे।
कानूनी विशेषज्ञों की राय और न्याय में देरी — एक बड़ी चुनौती
इस फैसले का कानूनी जगत ने स्वागत किया है — लेकिन साथ में कुछ जरूरी सवाल भी उठाए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जजों की संख्या बढ़ाना एक सकारात्मक और जरूरी कदम है — इससे लंबित मामलों के निपटारे में मदद मिलेगी। लेकिन केवल जजों की संख्या बढ़ाने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी — इसके साथ-साथ मामलों के प्रबंधन में सुधार और ढांचागत बदलाव भी जरूरी हैं। कोर्ट में मामले दर्ज होने की प्रक्रिया को सरल बनाना, अनावश्यक मुकदमेबाजी रोकना और क्षेत्रीय अपील कोर्ट स्थापित करना — ये कदम भी न्यायिक सुधार की दिशा में उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा इस साल कई जज सेवानिवृत्त भी होने वाले हैं — ऐसे में नई नियुक्तियां जल्द न हुईं तो बोझ और भी बढ़ सकता है।
भारत में न्यायिक लंबितता एक पुरानी और गंभीर समस्या है — सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में नहीं बल्कि हाईकोर्ट और जिला अदालतों में भी लाखों मामले सालों से लटके हुए हैं। एक अनुमान के मुताबिक देशभर की अदालतों में कुल पांच करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाना एक जरूरी कदम तो है — लेकिन यह समस्या का स्थायी हल नहीं है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि तकनीक का उपयोग, वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र और निचली अदालतों में भी जजों की भर्ती — ये सब मिलकर ही न्याय को वास्तव में तेज और सुलभ बना सकते हैं।
