तेहरान। 28 फरवरी 2026 की रात जब अमेरिका और इजरायल के लड़ाकू विमानों ने ईरान पर हमला किया, तो दुनिया ने एक ऐसी खबर सुनी जो दशकों से अकल्पनीय लगती थी — ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत। 36 साल तक ईरान की सत्ता की धुरी रहे खामेनेई उस हमले में मारे गए। आज उनकी मौत के करीब 70 दिन बाद — ईरान न टूटा, न झुका। लेकिन बदला जरूर है।
कैसे हुई खामेनेई की मौत?
महीनों की खुफिया तैयारी के बाद अमेरिकी CIA ने खामेनेई की हलचल को ट्रैक किया। जिस रात वरिष्ठ ईरानी अधिकारियों की एक अहम बैठक थी, उसी रात अमेरिका और इजरायल ने “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” को अंजाम दिया। खामेनेई के ठिकाने पर सटीक हमले हुए — और कुछ ही घंटों में ईरानी राज्य मीडिया ने उनकी मौत की पुष्टि कर दी। उनके साथ उनकी बेटी, दामाद और कई करीबी रिश्तेदार भी मारे गए।
देश में दो तरह की प्रतिक्रिया — एक ही देश, दो अलग दुनिया
28 फरवरी की रात जैसे ही खामेनेई की मौत की खबर फैली — ईरान दो हिस्सों में बंट गया।
शोक मनाने वाले क्यों रोए?
तेहरान के केंद्र में हजारों लोग काले कपड़ों में जमा हुए — “मौत हो अमेरिका को, मौत हो इजरायल को” (Death to America, Death to Israel) के नारे गूंजे। इनके लिए खामेनेई केवल एक नेता नहीं — बल्कि शिया इस्लाम की सर्वोच्च धार्मिक शक्ति का प्रतीक थे। उनकी मौत पर 40 दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित हुआ। मशहद में इमाम रज़ा के मज़ार के पास लोग बिलखते रहे।
जश्न मनाने वाले क्यों नाचे?
जनवरी 2026 में — मौत से महज कुछ हफ्ते पहले — खामेनेई ने अपने ही देश के प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का आदेश दिया था। उस नरसंहार में 36,000 से अधिक लोग मारे गए। करैज, शिराज, केरमानशाह, इस्फहान, संनदज जैसे शहरों में जश्न के वीडियो वायरल हुए।
देहलोरान में लोगों ने खामेनेई की मूर्ति गिराई — जबकि सुरक्षा बलों ने जश्न मनाने वालों पर गोलियां चलाईं। तेहरान के कुछ इलाकों में लोग छतों पर चढ़कर नाचे — “आज़ादी, आज़ादी” के नारे गूंजे — पटाखे फूटे — गाड़ियों के हॉर्न बजते रहे।
यह सिर्फ दो भीड़ों का फर्क नहीं था — यह ईरान की उस गहरी खाई का आईना था जो दशकों के दमन, आर्थिक बदहाली और जबरदस्ती थोपे गए धार्मिक शासन ने पैदा की थी। एक देश — दो ईरान।
नया सुप्रीम लीडर — बाप की विरासत, बेटे के हाथ
खामेनेई की मौत के ठीक 8 दिन बाद — 8 मार्च को — ईरान के 88 वरिष्ठ धर्मगुरुओं की परिषद “असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स” ने उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर चुना गया। यह चुनाव विवादास्पद रहा — रिपोर्टों के मुताबिक IRGC यानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने परिषद के सदस्यों पर दबाव डालकर जल्दबाजी में यह फैसला करवाया।
56 वर्षीय मोजतबा कभी किसी चुनाव में नहीं उतरे — लेकिन IRGC से उनके गहरे संबंध हैं। 2009 के विरोध प्रदर्शनों को कुचलने में उनकी भूमिका रही थी। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने खुलकर कहा था कि मोजतबा “अस्वीकार्य” हैं — लेकिन ईरान ने यह संदेश दिया कि उनके नेता का फैसला सिर्फ ईरानी करेंगे।
IRGC की पकड़ — और मजबूत
अमेरिका की योजना शायद यह थी कि नेतृत्व हटने से ईरानी हुकूमत कमजोर हो जाएगी। लेकिन हुआ उल्टा। IRGC ने सत्ता पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली। खुफिया विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिकी इंटेलिजेंस भी मानती है कि ईरानी शासन के पतन का कोई तत्काल खतरा नहीं है।
अभी क्या है स्थिति — शांति अभी दूर
युद्ध पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। 8 अप्रैल 2026 को पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते का अस्थायी सीजफायर हुआ था — लेकिन इस्लामाबाद वार्ता विफल रही। ईरान ने पाकिस्तान का 45-दिन का शांति प्रस्ताव ठुकरा दिया और अपना 10-सूत्री शांति एजेंडा पेश किया।
ईरान के विदेश मंत्री ने कहा कि समझौता “बस इंचभर दूर” था — लेकिन अमेरिकी वार्ताकारों की “अधिकतम मांगें” इसमें रुकावट बन रही हैं। अमेरिका चाहता है कि ईरान कम से कम 12 साल के लिए परमाणु संवर्धन बंद करे और 440 किलोग्राम 60% समृद्ध यूरेनियम सौंप दे। ईरान इसे सिद्धांतत: मानने को तैयार नहीं।
7 मई को ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे तीन अमेरिकी युद्धपोतों पर हमला किया — हालांकि कोई निशाना नहीं लगा। ट्रंप ने चेतावनी दी — “अगर समझौता नहीं हुआ तो ईरान से बस एक बड़ी चमक दिखेगी।”
ईरान टूटा नहीं — लेकिन जली हुई जमीन पर खड़ा है। शांति की उम्मीद है — समझौता अभी नहीं।
नोट: स्रोत / Image Source: Sonia Sevilla, Wikimedia Commons (CC BY-SA 3.0)
