नई दिल्ली/दुबई। मध्य पूर्व में छिड़ी जंग सिर्फ वहीं नहीं रुकी। उसकी आंच दुबई की चमचमाती इमारतों तक पहुंची — और वहां से सीधे भारत के आम आदमी की जेब तक। जो शहर कभी “स्थिरता का प्रतीक” माना जाता था, आज उसी दुबई में होटल बंद हैं, पोर्ट ठप हैं और लाखों प्रवासी भारतीय घर लौट रहे हैं। आइए समझते हैं — इस युद्ध की सबसे बड़ी अदृश्य मार कहां पड़ रही है।
दुबई — जब “सेफ हेवन” खतरे में आया
दुबई की पहचान तीन दशकों में एक ही बात से बनी — स्थिरता। कम टैक्स, विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा, पूर्व और पश्चिम के बीच सेतु। दुनिया भर के अमीर, व्यापारी और पेशेवर इसीलिए दुबई खींचे चले आते थे क्योंकि यह पड़ोसी अशांति में भी शांत रहता था। लेकिन 28 फरवरी 2026 के बाद से वह तस्वीर बदल गई।
युद्ध शुरू होते ही ईरान ने खाड़ी देशों के बुनियादी ढांचे पर हमले शुरू कर दिए। दुबई के जेबेल अली पोर्ट — जो खाड़ी क्षेत्र का सबसे बड़ा बंदरगाह है — पर हमले हुए। दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट — दुनिया का सबसे व्यस्त अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा — हफ्तों तक लगभग बंद रहा। 30,000 से अधिक उड़ानें रद्द हुईं। Amazon Web Services का एक डेटा सेंटर ईरानी ड्रोन के मलबे से क्षतिग्रस्त हुआ — शायद इतिहास में पहली बार किसी बड़े क्लाउड डेटा सेंटर को युद्ध में नुकसान हुआ।
पर्यटन तबाह: 2025 में दुबई ने 1.9 करोड़ अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों का रिकॉर्ड बनाया था। लेकिन अब होटल बुकिंग 60-70% तक गिर गई हैं। कई होटलों ने खर्च बचाने के लिए रिनोवेशन का बहाना बनाकर दरवाजे बंद कर लिए हैं।
शेयर बाजार: UAE के शेयर बाजार 2-3 मार्च को बंद करने पड़े — यह UAE के इतिहास में पहली बार हुआ।
नुकसान का अनुमान: विशेषज्ञों के मुताबिक UAE को अब तक करीब 6,000 करोड़ डॉलर का नुकसान हो चुका है। अमेरिकी ट्रेजरी UAE को आर्थिक मदद देने पर विचार कर रही है।
भारत — आम आदमी की जेब पर सीधी मार
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक (Importer) देश है। और उस तेल का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से होर्मुज़ के रास्ते आता है। जैसे ही होर्मुज़ बंद हुआ — भारत पर तीन तरफ से मार पड़ी।
पेट्रोल-डीजल महंगा: युद्ध से पहले कच्चे तेल का भाव करीब 70 डॉलर प्रति बैरल था। युद्ध के बाद यह 122 डॉलर तक पहुंच गया। भारत सरकार ने आम आदमी को राहत देने के लिए पेट्रोल और डीजल पर प्रति लीटर 10 रुपये का उत्पाद शुल्क घटाया — लेकिन इससे सरकारी खजाने को बड़ा झटका लगा।
रुपया कमजोर: डॉलर के मुकाबले रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर 94.78 प्रति डॉलर तक गिर गया। इससे आयात (Import) और महंगा हुआ और महंगाई बढ़ी।
LPG और गैस की किल्लत: होर्मुज़ से प्राकृतिक गैस (LPG) की आपूर्ति ठप होने से LPG सिलेंडर की किल्लत कई शहरों में देखी गई और साथ ही कीमतों में भी तेज उछाल आया।
2 लाख से ज्यादा भारतीय लौटे घर
सबसे मार्मिक असर वहां (Middle East) काम करने वाले भारतीयों पर पड़ा है। मार्च 2026 तक खाड़ी देशों और ईरान से 2 लाख 20 हजार से अधिक भारतीय वापस आ चुके हैं। खास बात यह है कि ये सिर्फ मजदूर नहीं — इनमें कुशल पेशेवर और व्यापारी भी हैं जो वर्षों से खाड़ी में जमे हुए थे।
खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीय हर साल करोड़ों रुपये रेमिटेंस के रूप में भारत भेजते हैं। इस प्रवाह में भी भारी गिरावट आई है जिसका असर उत्तर प्रदेश, केरल, बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों पर सबसे ज्यादा पड़ा है जहां खाड़ी में काम करने वालों की संख्या सबसे अधिक है।
आगे क्या?
जब तक होर्मुज़ नहीं खुलता — भारत और दुबई दोनों के लिए राहत मुश्किल है। भारत सरकार ने रूसी तेल के अतिरिक्त स्ट्रैंडेड कार्गो खरीदने की आपातकालीन अनुमति ली है — ताकि होर्मुज़ बंद होने से पैदा हुई कमी को पूरा किया जा सके — लेकिन यह स्थायी हल नहीं है। दुबई के पास वित्तीय भंडार मजबूत हैं — और वह पहले भी संकट से उबरा है — लेकिन इस बार का संकट उसके इतिहास में सबसे गहरा है।
जंग वहां लड़ी जा रही है — पर दर्द यहां तक पहुंच रहा है।
नोट: Photo — San Photography / Pexels (Free to use)
